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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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यह मत जानो हिरवा जरवा बनियाँ दूकान बिकानियाँ ॥

अलख मूलक हिरवा मोरा अगम देशते अनियाँ ।

एक है चोर सकल जगमोसे राजा रैयत रनियाँ ।

कहैं कबीर सुनो भाइ साधो अलख है नाम निशनियाँ ॥

ऋषीश्वरोंके बचन ।

रामचन्द्रका प्रश्न-ज्ञानीके सारे कार्य अज्ञानियोंके समान होते हैं । ज्ञानी किस प्रकार पहचाना जावे ? वसिष्ठ मुनिका उत्तर-हे रामचंद्र ! एक सूक्ष्मवेद है दूसरा एक पुरुषमवेद है । सूक्ष्मके द्वारा आप अपने स्वरूपको जान सकता है । दूसरी युक्तिसे नहीं जान सकता । पुरुषम वेदका चिह्न यह है कि, तप, यज्ञ, व्रत इत्यादि करे । ज्ञानीजीका चिह्न सूक्ष्म वेद है । यह वसिष्ठपुराण निर्वाण प्रकरण पूर्वाध भाग एक सौ दो सर्गमें लिखा है ।

फिर उसी ग्रंथके दो सौ उन्तीस सर्गमें लिखा है कि, हे रामचन्द्र ! जैसे सर्पके बिलको सर्पही जानता है ऐसेही ज्ञानीका चिह्न सूक्ष्म वेद है । उसी निर्वाण प्रकरणके एक सौ ग्यारहवें सर्गमें लिखा है कि, ज्ञानका लक्षण सूक्ष्म वेद है पुरुषमवेद नहीं है ।

फिर इसी ग्रंथके मुमुक्षु प्रकरणके चौथे सर्गमें लिखा है कि, हे रामचन्द्र ! जीवन्मुक्तिसे विदेहमुक्तिका भेद प्रत्यक्ष है । परन्तु तुझको मालूम नहीं हो सकता । ज्ञानीको निमित्ता नहीं है । ज्ञानीका लक्षण सूक्ष्मवेद है । मुनिजीकी विचारमाला देखो । सन्तोंकी श्रेष्ठता सूक्ष्मवेदसे भी परे है ।

इस प्रकार समस्त ऋषि मुनि और सिद्ध साधु बराबर सूक्ष्मवेदकी ही प्रशंसा करते चले आते हैं । अब मैं इसी विषयपर शिवतंत्रका प्रमाण देता हूँ ।

शिवतंत्रका प्रमाण ।

मम पञ्चमुखेभ्यश्च पंचाम्नाया विनिर्गताः पूर्वश्च पश्चिमश्चैव दक्षि-

णश्चोत्तरस्तथा ॥ उर्द्धाम्नायाश्च पंचैते मोक्षमार्गाः प्रकीर्तिताः ॥

आम्नाया बहवः सन्ति ऊर्द्धाम्नायात् नोत्तमः ।

अनुवाद-ब्रह्मा कहता है कि, मेरे पाँच मुँहसे पाँच वेद निकले । पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण और ऊपरके । उन पाँचोंने मुक्तिमार्ग दिखलाया । वेद तो अनेक हैं पर ऊपरके मुँहवाले वेदके समान और दूसरा कोई नहीं है ।

अब चारों वेदको तो अनेक मनुष्य पढ़ते हैं परन्तु सूक्ष्म वेदका पढ़ने वाला कोई विरलाही पुरुष होगा । क्योंकि, अन्य शास्त्रोंकी शिक्षासे मनुष्य काम क्रोधादि के प्रपञ्चोंसे निवृत्त हो नहीं सकता । परन्तु सूक्ष्मवेदका पाठ सब कामनाओं तथा