BharatKosha
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 382 of 1367

Read in context
Page 382

चौथे अध्याय—ब्रह्माने नारदसे कहा कि, हम तीनोंने इस महामायाके समीप जानेका उद्योग किया, इतनेमें एक विमान आकाशसे उतरा, उस विमानसे सहस्रों प्रकारकी स्त्रियोंको उतरती देखकर हम तीनोंको अत्यन्तआश्चर्य हुआ, उनमें कोई पुरुष नहीं था, सब स्त्रियाँ थीं, तब हम तीनों देवताओंने स्त्रीरूप धारण कर लिया, हमभी उन स्त्रियोंके बीचमें गए, उनका सौन्दर्य हमारे कथनसे बाहर है, इस महामायाको बड़के पत्तेपर सोया देखकर हम उसके चरणोंके समीप गए, तब समस्त स्त्रियोंने हमारी ओर देखा, उनको हमारे स्त्री होनेका ज्ञान नहीं हुआ। तब श्रीमहामाया मुसकराई, और प्रसन्न हुई, उस समय उस महामायाके चरणोंके नखोंमें एक कौतुक दिखलाई दिया कि, जैसे दर्पणमें मूर्तिका प्रतिबिम्ब दिखलाई देता है। वैसेही इसमें अनगिनती ब्रह्माण्ड और अनगिनती वृक्ष और पर्वत और अनगिनती ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इत्यादि देखे बरुण, वीर त्वष्टा, विश्वआत्मा नारद, ऋषि, मुनि, गंधर्व, अश्विनीकुमार, सहस्रों प्रकारके नाग, वैकुण्ठ, स्वर्ग, पाताल और विष्णुकी नाभिकमलमें ब्रह्मा भी देखा, मधु कंटभकी लड़ाई भी देखी, इस मायाका पारपाया नहीं जाता। इस प्रकार सौ वर्ष पर्यन्त हमने मेधासमुद्रमें कौतुक देखा, इस कौतुक देखनेके उपरान्त विष्णु महाराज देवीकी स्तुति करनेको दंडायमान हुए कि, हे महामाये सच्चिदानन्द रूपिणी ! मैं तुमको नमस्कार करता हूँ कि, समस्त पृथ्वी आकाश पर्वत और जलके बीच आपही समा रही हो। हे मातः ! यह महाज्ञान हमको आपके चरणोंके प्रतापसे हुआ, समस्त कर्तव्याकर्तव्यको मैंने जाना, आपके चरणोंके प्रभाव विना किसीको ज्ञान नहीं होता, संसारमें यह बात स्तब्ध है कि विष्णु विना और दूसरा कोई नहीं, परन्तु आपके चरणोंके प्रभावसे यह ज्ञान मुझमें उत्पन्न हुआ, हे मातः ! जिस समय मुझको नींद आगई थी उस समयभी तुम्हारी कृपासे मधु कंटभका नाश हुआ, ब्रह्माकी रक्षा की थी। इस संसारमें देवता और मनुष्य जानते हैं कि, विष्णु पालन करता है। परन्तु विना आपके मुझको पालनेका सामर्थ्य नहीं है। हे मातः आपके नखोंमें अनेक ब्रह्मा और अनेक विष्णु और अनेक रुद्र इत्यादिको देखकर मेरी बुद्धि चक्कर खागई, अब मुझको ज्ञान हुआ कि, मैं स्त्रीरूप होकर सर्व आपकी सेवा किया करूँ।

पाँचवाँ अध्याय—विष्णुके उपरान्त शिवजीने बड़ी स्तुति की कि, हे मातः ! जो कुछ है सो सब तेरी लीला है। तेरे विना हम कौड़े मकोड़ेके समान भी नहीं, तेरीही कृपासे मैं जगत्का संहार करता हूँ। जब शिवजीने स्तुति की तब महामाया के मुखसे एक मंत्र निकला, उसको शिवजीने याद करलिया, उसके कारण प्रत्येक स्थानपर शिवजीको महामायाकी मूर्ति दिखलाई दी। फिर नारदजीने स्तुति की