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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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गौतम ऋषि ।

आपभी ज्ञानके अगाध भण्डार वेदके मंत्रोंके द्रष्टा हैं। अनेकों ऐसे शास्त्रोंके प्रवर्तक हैं, जिनसे मनुष्योंका कल्याण हो। अहल्या आपकी ही पत्नी थी, जिसे कि, भगवान् रामने पत्थरसे मनुष्य कर दिया था। आपके बहुतसे कार्य आपकी प्रसिद्धिके हैं पर यह काम सबसे अधिक है कि, आपकी भक्तिके वश ही भगवान् रामने आपकी शिला बन कर पड़ी हुई स्त्रीमें चरण लगाकर उसे फिर अहल्याही बना दिया। आपकी भक्तिकी कथा सदा भूमण्डलको पवित्र करती रहेगी।

कपिल मुनि ।

ये सांख्यशास्त्रके आदि प्रवर्तक हैं। आपने अज्ञानी पुरुषोंको आत्मतत्त्व बतानेके लिये कर्दमऋषिसे देवहूतिमें अवतार लिया था। इन्होंने तत्त्वोंका निर्णय माताको सुनाया था कि, संसारका कल्याण हो। इनका पूरा उपदेश श्रीमद्भागवतके तीसरे स्कन्धमें मिलता है। ये जीव ईश्वर और प्रकृति इन तीन पदार्थोंको मानते हैं। सांख्यशास्त्रका कपिलसूत्र इन्हींका बनाया हुआ है। सांख्य-कारिकाके निर्माता ईश्वर कृष्णपर आके इनके शास्त्रके दो भेद हो गये। यानी उसके इनके शास्त्रको निरीश्वरवादपर लगाया, केवल मुक्त पुरुषोंकोही ईश्वर माना। यह एक सत्य पुरुषका अवतार है जो लोगोंकी ज्ञान पिपासाको शान्त एवं सफलभूत करनेके लिये आपका अवतार हुआ था। आप ज्ञानियोंकी अवस्था दिखानेके लिये सदा योग समाधिमें ही रहे आते हैं।

दत्तात्रेय ।

ये भी प्रेम मदिराके दीवानोंमें गिने गये हैं। ये अत्रिमुनिके पुत्र तथा दुर्वासाके भाई ये अत्रिमुनि ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर सौवर्षतक कुलाद्रि पर पवनाहारी होकर एक पैरसे खड़े होकर तप करते रहे। जब इनके तपसे तीनों लोक विचलित हो उठे उस समय तीनों देव ऋषिजी महाराज के पास आ उपस्थित हुए। अत्रिने वर माँग लिया कि, आप मेरे घर जन्म लें तथा तीनों देवोंने भी इस बातको स्वीकार कर लिया। पीछे विष्णुके अंशसे दत्तात्रेय, शिवके अंशसे दुर्वास तथा ब्रह्माके अंशसे सोमकी उत्पत्ति हुई। ये परमहंसपथक प्रवर्तक थे। भगवानके भरोसे रहा करते थे लोगोंको दिखाते थे कि, प्रेम मदिराके दीवाने कैसे रहा करते हैं। एक बार ये सहस्रमुता कावेरीके किनारेके सानुपर पड़े हुए प्रह्लादको मिले। उस समय इन्हे कोई नहीं जान सकता था। कौनसे भी वर्ण आश्रम, आकृति और चिह्नोंसे नहीं पहिचान सकता था। प्रह्लादन चरणोंमें पड़कर पूछा कि, आप उद्यम तो कुछ भी नहीं करते परन्तु शरीर इतना