कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextयोहन बपत्तिसम देता फिरता था । यह मनुष्य बनमें अधिक तथा नगरमें बहुत कम रहा करता था । इसकी शिक्षा तथा उपदेश प्रभाव शाली हैं । हीरोद बादशाहने उसको बंधनमें डाल दिया था, यह बड़ा उपदेशक था, एक स्त्रीको व्यभिचारके लिये उपदेश दिया, यह स्त्री उसकी बैरिन होगई, उसीकी सटसे योहन्ना मारा गया ।
मुहम्मद साहब ।
मुसलमान लोग मुहम्मद साहबको अन्तिम अनागतवक्ता समझते हैं । ये तीनों श्रेष्ठ भविष्यद्वक्ता हैं मूसा ईसा मुहम्मद इबराहीमकी संतान हैं मुसलमानोंकी पुस्तकमें लिखा है कि, इबराहीमसे लेकर मुहम्मदपर्यन्त इस घरानेमें चालीस सहस्र अनागतवक्ता होगए । कबीरजीके सांप्रदायी कहते हैं कि, मुहम्मद महादेवका अवतार है, महादेव भूत, प्रेत, जिन, परी, राक्षस, दैत्य इत्यादिका बादशाह है । देखो तवारीखमुहम्मदीमें । जब मुहम्मदसाहबने पृथ्वीपर अपना धर्म प्रचलित किया, उस समय सहस्रों जिन परी इत्यादि आपसे आप आकर मुहम्मद साहबके शिष्य होगए । सबोंने मुहम्मदी कलमः पढ़ा । यह मुहम्मद भूत प्रेतादिकके प्राचीन गुरु हैं । सुतरां तुलसीकृत रामायण बलकाण्डमें लिखा है, कि, जब शिवजीका विवाह राजा हिमालचलके घर हुवा, तब शिवजी जब विभूति रमाए सर्प इत्यादि गलेमें डाले बैलपर सवार होकर चले, उस समय ब्रह्मा, विष्णु, कुबेर, इन्द्र, वरुण आदिक देवता बड़े ठाठके साथ बन ठनकर बरातके साथ साथ चले । उस समय विष्णु महाराज जो बड़े हँसोड हैं हँसकर बोले कि, ए भाई ! समस्त देवताओ ! अपना अपना समाज लेकर पृथक् २ चलो । यह बात सुनकर समस्त देवतागण पृथक् २ होके चले । तब शिव अकेले रह गए । उस समय शिवजीने अपना शंख फूँका उसकी ध्वनि सुनतेही सहस्रों भूत प्रेत तथा जिन इत्यादि आनकर उनके चारों ओर एकत्रित होगए । शिवकी विचित्र बरात देखकर विष्णु तथा समस्त देवतागण हँसने लगे । पथमें बड़े बणे कौतुक होते चले । इसी प्रकार मुहम्मद साहबने जब मक्का नगरके बाहर जा, एक टीलेपर खड़े होकर हाँकें लगाई, तब सहस्रों जिन और परी इत्यादि आकर मुहम्मद साहबके शिष्य हुए । विष्णुके उपरान्त महादेव समस्त देवताओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं । सांसारिक वासनाओंपर आपकी श्रेष्ठ रुचि रहती है । महादेव तथा मुहम्मदका गुण एकही है । मार काट रक्तपात विनाश करनाही आपके धर्म हैं । सृष्टिके आरम्भमें शिवजीने भक्ति चलायी, मनुष्य जातिके गुरु बने, वही अन्तिम अनागतवक्ता हुए । संस्कृतमें महादेवजीका नाम महामदमय है ।