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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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कृपादृष्टि हुई तब परमेश्वरने अपना मानुषिक स्वरूप दिखलाया । तब खरकैलने देखा और वार्तालाप किया ।

ऐसाही ईसाने अपना विराट् रूप पोटर्स योहन्ना और याकूबको दिखलाया । जब मसीहने अपना तेज प्रगट किया । वह स्वरूप जो नितान्तही तेजमय और सूर्य के आकाशके सदृश जगमगाता था ऐसा स्वरूप जब दिखाई दिया तब पोटर्स, योहन्ना और याकूब मुँहके बल गिर पड़े । ईसूका वह तेज देख नहीं सके । फिर जब दया हुई तब ईसाने अपना पहिला स्वरूप प्रगट किया । उससे आपके शिष्यगण प्रसन्न हो गये ।

इस प्रकार जिस किसीको विराट्पुरुषका पूर्णतया ज्ञान हो गया वह स्वयम् विराट् स्वरूप हो गया । पिता और पुत्र सब एकही स्वरूप हैं । विद्या और कार्य के दोषसे ऊँचे नीचे भूतय तथा स्वासी बने हैं । जो पिता है सो पुत्र है और जो पुत्र है सो पिता है । जब पिता पुत्र मर गया तब आपही आप हैं ।

विराट्की उपासना ।

इस विराट्को साधुलोग शून्यमें देखते हैं । जब उसकी साधना करते हैं, तब समीप चला आता है तथा वार्तालाप करता है । तीनों कालका समाचार देता है । विराट्पुरुष साधनेसे सिद्ध कहलाता है । गुप्तबातोंको प्रगट करता है, परन्तु जब साधनेमें बाधा न उपस्थित हो तब कार्य पूर्ण हो ।

इस विराट्पुरुषसे सब कुछ उत्पन्न हुवा हैं । चार खानचौरासी लाख योनिके जीव सब इसी पुरुषने बनाए हैं । वेदपुस्तकें और समस्त साधन इसीसे हुये हैं । इस विराट् देहके सब जीव कीड़े हैं । समस्त साधन और सब सांसारिक तथा धार्मिक पदार्थ उसके शरीरके मल हैं सब उसके निर्मित किये हुए हैं । भला उसके शरीरके कीड़ोंमेंसे किसको सामर्थ्य है कि, उसको अधीन करके उसके मस्तकपर लात धर कर पार चला जावे । किसी ऋषि मुनि सिद्ध साधु और पीर पंजम्बरमें यह बल नहीं कि, इसके आगे हो जावे । उसपर श्रेष्ठता पावे । सबके सब उसके सेवक उसका भोजन हैं । यदि वह सत्यगुरु हाथ न पकड़े तो किसीको सत्यपुरुषका घर न मिले, चार स्थानसे बाहर कोई न जासके । मच्छर और मक्खीमें यह सामर्थ्य कहाँ है कि, उड़कर सातवें आकाशपर जो बैठे ? कदापि नहीं । चौरासी लाख योनिसे तो वही पार करे कि, जो स्वयम् उससे पार जानेका सामर्थ्य रखता हो । जो माली वाटिका लगाता है उसकी वाटिकामें जितने वृक्ष पौधे इत्यादि हैं उनमें मालीसे बढ़कर किसीमें विशेषता नहीं है । एक मिट्टीसे कुम्हार सहस्रों प्रकारके

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