कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextऽकल्पयन् ॥ य० अ० ३१ मं० १३ ॥ इस विराट्पुरुषकी नाभिके सकाशसे अंतरिक्ष (आकाश) उत्पन्न हुवा, शिरसे स्वर्ग उत्पन्न हुवा पावोंसे पृथ्वी उत्पन्न हुई कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुई तथा इसी तरह विराट्पुरुषके शरीरसे भूआदिक लोक उत्पन्न हुए ॥ यत्पुरुषेणहविषादेवायज्ञमतन्वत ॥ वसन्तोऽस्यासीदाज्यंग्रीष्मऽद्वैतः शरद्द्वैतः ॥ य० अ० ३१ मंत्र ॥ १४ ॥ जिस कालमें विद्वानोंने विराट्देहरूप हवि (हवनकरनेका अन्न) करके ज्ञानयज्ञको विस्तारित किया तब इस ज्ञानयज्ञके लिये वसंत ऋतु घृत हुवा ग्रीष्म ऋतु हवन करनेके समिधाएँ हुवा । तैसेही शरद ऋतु हवि (होमकरनेका अन्न हुवा) ॥ सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्तसमिधःकृताः ॥ देवायद्यज्ञन्तवाना अवधन्तपुरुषम्पशुम् ॥ य० अ० ३१ मंत्र १५ ॥ जिस कालमें विद्वानोंने ज्ञानयज्ञको किया उस समय विराट्पुरुषरूप पशुको बांधा अर्थात् भाव करते भये उस कालमें १२ महीने ५ ऋतुएँ ३ लोक १ यह आदिःय ऐसे २१ अथवा गायत्री आदि ७ अतिजगती आदि ७ कृत्य आदिक ७ ऐसे २१ छंद ये संपूर्ण समिध (होमकरनेकी लकड़ियाँ हुई । यज्ञेनयज्ञमयजन्तदेवास्तानिधर्मार्णिप्रथमान्यासन् ॥ तेहनाकम्भहिमानः सचंतयत्रपूर्वसाध्याःसन्तिदेवाः ॥ य० अ० ३१ ॥ मंत्र १६ ॥ और वे विद्वानोंने विराट्रूप, हविसंबंधी ज्ञानयज्ञकरके यज्ञपुरुष महानारायणका पूजन किवा । महानारायणपूजनसंबंधी वे धर्म मुख्य जहाँ प्रथम साध्य देवता स्थित हैं उस महानारायण सत्यलोकको महानारायणके भक्त महात्मा प्राप्त हुये ॥
यह सोलह मंत्र आवश्यक माने जाकर यजुर्वेदसे उद्धृत किये गये हैं । मेरा विशेष तात्पर्य यह कि, सांसारिक मनुष्योंको मालूम होवे कि, वे लोग किसका पूजन करते हैं ? तात्पर्य यह कि, वे सच्चे परमेश्वरकी पूजन करते हैं, अथवा झूठे परमेश्वरकी । जो कोई सच्चे परमेश्वरकी पूजन करता है, वह सच्चा होजाता है । सो वे लोग जाने कि, यह समस्त सृष्टि विराट्पुरुषद्वारा है । उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश सब उसीके गुण हैं । यह विराट्पुरुष समस्त रचना करता है । उसकी और अक्षर पुरुष जो लाहृत स्थानमें रहता है उसकी प्रेरणा भी होती है । जो सत्य पुरुष सबका स्वामी है, उसके आज्ञाकारी सब हैं । यहाँ वेदमें इसी सत्यपुरुषका प्रकरण दिखाया गया है । तथा विराट्का भी आया है । जो भवसागर है उसका रचयिता तथा राजा यह विराट्पुरुष अलख निरंजन है । सांसारिक मनुष्य लड़ते और झगड़ते हैं, इसको निराकार कहते हैं, न जाने सत्य कहते हैं, अथवा मिथ्या कहते हैं । जिसका उनचास करोड योजनाका शरीर हो वह निराकार कैसे कहलावे, जिससे समस्त गुण उत्पन्न होते हैं, सदैव उसके साथ रहते हैं, वह निर्गुण कैसे