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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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अकालपुरुषके धार्मिक नियम ।

अकालपुरुषके धार्मिक ग्रंथ चार वेद हैं । ये चारों वेद मायासृष्टिके आरंभ कालमें प्रकट हुए । ये चारों ग्रन्थ वैदिकभाषामें निकलकर समस्त संसारमें फैल गए । वैदिक संस्कृत भाषा होनेके कारण इसके समझानेवाले धोखेमें पड़े । कारण यह कि, इसका अर्थ कोई किसी प्रकार और कोई किसी प्रकार करता है वास्तवमें वेदके भाषाकारोंमें किसीको ऐसी विद्या नहीं हुई कि, इस वेदकी यथार्थ अवस्था को जान सके । सबके सब शब्दार्थ लगाकर लोगोंपर अपना विचार प्रगट करते आए हैं । प्रत्येक मनुष्य अपने ढङ्गपर अपनी मृत्यनुसार आप समझाते रहे । विचारहीन सांसारिक मनुष्य जिस पथके अधीन हुए, उन्होंने वही अर्थ स्वीकार कर लिया । उनको उसी ढङ्गपर चलना पड़ा । उनको मिथ्या तथा सत्यकी क्या सुध, वे तो अपने गुरु तथा अग्रगामीकी पथदर्शकताको स्वीकार करके वही सत्य मानते हैं । वही ठीक ठहराते हैं । अयथार्थवक्ता विद्वानोंने लोगोंको भटका मारा । वेदकोशमें एक शब्दके अनेक अर्थ होनेके कारण जिस किसीको जो अर्थ अच्छा जान पड़ा वही अर्थ लगाया । अपने विचारके अनुसार विख्यात किया । वेदकी उलझनोंसे समस्त संसार अनभिज्ञ रहा । वास्तविक भेदको कोई न जान सका कि, इस यवनिकाके भीतर कौनसा रहस्य भरा पड़ा है । इस कारण समस्त संसार धोखेमें पड़ा । बिना भक्तिवेत्ताके तथा सत्यपुरुषकी भक्ति और मुक्तिमार्गको पहचाने नहीं जान सके । इस कारण कालपुरुषने वेदके वास्तविक पदार्थको छिण कर समस्त मनुष्योंको फँसा लिया । कबीर साहब सृष्टिकी उत्पत्तिकालसे लेकर आजपर्यन्त बराबर समझाते आते हैं कि, काल पुरुषके धोखेकी चालसे बचो परन्तु यह, जीव नहीं समझता, नहीं मानता । कारण यह कि, मनुष्योंकी बुद्धिपर परदा पड़ रहा है यदि वेदकी वास्तविकताको समझ जाय तो सत्यपुरुषको पाजाय ।

इन्हीं चारों वेदोंसे जो चारों पुस्तकें निकली हैं और भिन्न २ भाषाओंमें उनका अनुवाद हो चुका है, उनके द्वारा वेदोंकी थोड़ीसी अवस्था जानी जा सकती है । क्योंकि, इसका यथार्थ ज्ञान होना सत्यपुरुषकी इच्छा पर निर्भर है । उसके मुँहसे अग्नि उत्पन्न हुई उसी पुरुषके मुँहसे ब्राह्मण उत्पन्न हुवा इस कारण ब्राह्मण को यज्ञ करने और करानेका भाग मिला । वेदपाठका अधिकारी विशेषतः ब्राह्मण ठहराया गया । यद्यपि इतरोंके निमित्त भी वेदपाठ अत्यन्त आवश्यक है । कारण यह कि, यह प्रथा समस्त संसारके निमित्त नियत की गई है, सबकी ऐतिहासिक बातें पृथक् हैं, कर्मकाण्ड एक जैसीही है ।