कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकबीर- जाय मिल्यो परिवारमें, सुखसागरके तीर ।
वरण पलट हंसा किया, सद्गुरु शब्द कबीर ॥
प्रेम पि^१^ छौरी तानके, सुख मन्दिरमें सोय ।
घर कबीरको पायके, कहा मुक्तिको रोय ॥
कबीर- बहुत गुरु भए, जगतमें, कोई न लागे तीर ।
वै गुरु वह^२^ जायगे, जाग्रत^३^ गुरु कबीर ॥
कबीर- पीर पैगम्बर औलिया, धर धर मरे शरीर ।
अजर अम्बर^४^ पलटे नहीं, ताका नाम कबीर ॥
मैं कबीर । बिचलों^५^ नहीं, शब्द मोर^६^ समरर्थ^७^ ।
ताको लोक पठाइहों, जो चढ़े शब्दके रथ^८^ ॥
कबीर- ओंकार निश्चय किया, यह कर्ता मत^९^ चान ।
साँचा शब्द कबीरका, परदेमें^१०^ पहचान ।
अनन्त कोटि ब्रह्मण्डका, एक रती नहि भार ।
साहब पुरुष कबीर है, कुलका सर्जनहार^११^ ॥ [क. वी. ६३८]
इसी प्रकार समस्त सूक्ष्म वेदमें कबीर साहबकी प्रशंसा भरी हुई है, भली भाँति खोल खोल पुकार पुकार बारम्बार कबीर साहबने कहा है कि, मैं स्वयम् सत्यपुरुष हूँ, स्वयम् मैं ही सृष्टिका रचयिता तथा समस्त जगत्का स्वामी हूँ, मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है । जो कोई मुझको पहचानेगा वो भव-सागरके पार हो जावेगा ।
वेदमें कबीर ।
आशुः शिशानो वृषभो न भीभो, घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्, संकन्दनो निमिष ए कबीरः शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः ॥ य० अ० १७-३६ ॥
हे कबीर ! आप चारों ओरसे अविगत शब्द रूप हो । देहसे रहित रूप विदेह हो, विना शरीरके हो, समस्त पवित्रावतार आपके हैं, सैकड़ों बार प्रकट होते हो सबके ज्ञान रूप और परम विजयी हो यही मन्त्र सामवेदमें भी आया है, यहाँ इसका जो अर्थ है वही वहाँ भी अर्थ है ।
सुकृत नाम ।
अधज्मोऽधवादिवो बृहतो राचनादधि अया वर्धस्व,
तन्वा गिरा ममाजाता सुकृतो पृण ॥ सा. १. ८. ॥ प्र. १ ॥
१ चादर, २ पानीसे खिंचे, ३ जगता हुआ, ४ अमर, ५ चलायमान, ६ मेरा, ७ भक्तिवाला,
८ रथ, ९ न, १० दिलके भीतर, ११ रचनेवाला ।