कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextपैदा हुआ, उसने स्वयं अपनेको किया इस कारण उसे सुकृत कहते हैं। जब आत्माने अपना रूप पाया और निर्गुणसे सगुण हुवा, आपसे अपनेको प्रगट किया। इस कारण उसका नाम सुकृत है।
यहाँलो तो मैंने परसंवेद अथवा प्रकृत वेदका प्रमाण लिखा। अब जानना चाहिये कि, कुल प्रकृत वेद बराबर इस बातकी साक्षी देते हैं कि, ये कबीर ! तू ही समस्त संसारका सर्जनकर्ता तथा प्रबंध कर्ता है। अनन्त करोड़ ब्रह्माण्ड सब तेरी रचना है। एकोत्रके कुछ श्लोक जो मैंने लिखे हैं, वे एक सौ श्लोक पर्यन्त बराबर शिवजी कबीरके नामकी प्रशंसा करते गए हैं। पार्वतीजीका मन रख गए हैं। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य और समस्त ऋषि मुनि आरम्भसे आजलों बराबर करते आए हैं। जबभी करते रहे तथा करेंगे।
ऋषीश्वरोंका वचन।
रामानन्द—कर्ता तुमही साधू हो, सत कबीर है देव।
तनमन हों तुमें अपि हौं, कुलदिक्षा तोहि देव ॥ [क. १० आ. ४३]
धर्मदास—बाजा बाजे रहितका, परा नगरमें शोर।
सद्गुरु खसम कबीर हैं, नजर न आवे और ॥ [क. १० आ. ४०]
गोरखनाथ—नौनाथ चौरासी सिद्ध, इनका अनहद ज्ञान।
अविचल घर कबीरका, यह गति विरला जान ॥
झोरी झण्डा कूबरी, शैली टोपी साथ।
दया भई जब कबीरकी, चढ़ाई गोरखनाथ [क. १० आ. ४]
नाभाजी—बानी अरब व खरबलौं, ग्रंथों को हज़ार।
कर्ता पुरुष कबीर है नाभे किया विचार ॥ [क. १० आ. ४९]
राग महला पहला।
नानकशाह—यक अर्ज गुफ्तम पेश तू दर गोश कुन करतार।
हक्का कबीर करीम तू वे ऐब परवरदिगार ॥
दुनियाँ मुकाम फानी तहकीक दिलदानी।
मन सर मूह इजराईल गिरफ्त दिलबीच नदानी ॥
जन पिसर बेरादर कसनेस्त दस्तमगीर।
आखिर बेयफ्तम कस नदारम चूंशब्द तकबीर ॥
शप्रोरोज गशतम दरहवा करदेमबदीख्याल।
गाहेन नेकी कारकरदम मन ईंचुनी अहवाल ॥
बदबस्तहमचू दखील शाफिल बेनजर बेबाक।
नानक बगोयदजीं तोरों पातरा चाकरा पाखाक ॥