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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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ऐसे पुरुष कबीर हैं, शून्यमें रहे समय ॥
गरीब, गगनमण्डलसे ऊतरे, साहब पुरुष कबीर ।
चोला धरा खवासका, तोड़े यम जञ्जीर ॥
गरीब, आदौ आदि कबीर हैं, चौदह भुवन विशाल ।
हीरे मोती बहुत हैं, कबीर लालनके लाल ॥
गरीब, ऐसा निर्मल ज्ञान है निर्मल करे शरीर ।
और ज्ञान मण्डल सबै, चक्के ज्ञान कबीर ॥

चौपाई— दास गरीब कबीर को चेरा । सत्य लोक अमरपुर डेरा ॥
अमृत पान अमिय रस चोखा । पीवे हंसा नाही धोखा ॥

पर प्रकट हो कि, समस्त सिद्ध साधु ऋषि मुनि पीर पैगम्बर जिस किसी सत्यगुरुको पहचाना उसकी श्रेष्ठताको जाना, वो मृत्युजित् हो गया । तीनों कालके औलिया अम्बिया साधु ऋषि मुनि बराबर इसी प्रकार उसकी प्रशंसा करते चले आते हैं । भली भाँति जाँच करते और पवित्र पुस्तकों तथा हदीसों इत्यादिसे मालूम हो जावेगा । चारों वेद पुराण आदि सब सत्यगुरुकी प्रशंसा किया करते हैं । कबीर साहबके भिन्न भिन्न नामोंसे सब ग्रंथों तथा पुस्तकोंमें उसकी प्रशंसा लिखी हुई है । जो सत्यगुरुका हंस अड़कुरी जीव होगा सो तुरन्त इस सत्यगुरुको पहचान लेगा तनिक विलम्ब न लगेगा, कोई सन्त जौहरीही मणिकी पहचानमें होता है । घेदों और पुस्तकोंमें कबीर साहबकी प्रशंसा तो अनेक स्थानोंमें लिखी देखते हैं । कोई पण्डित पढ़कर सोचता हुआ अर्थ लगाता है कि, कबीर नाम रामचन्द्रका है । कोई कहा है कि, कबीर नाम विष्णु किम्बा राम चन्द्रका है । पण्डितोंमेंसे कोई यों कहता है कि, इन महाशयोंमें कोई कबीरके नामके योग्य नहीं दिखाई देता; पर शून्य चैतन जो ब्रह्म है उसको कबीर कहते हैं । अब विचारना उचित है कि, यदि चैतन्य ब्रह्म उस सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरका नाम है तो वह कौन है कौन गुरु उससे मिलता है, कौन शास्त्र उससे संयुक्त होनेका पथ दिखाता है ? यदि उसको निर्गुण निराकार ठहराते कि, जिसके श्वाससे चारों वेद निकले तो यह बात भी नहीं दीखती सो कि, वेदकी आज्ञाएँ, स्पष्ट प्रकट करती है कि, वह पुण्यात्मा परमेश्वर जिसकी, आज्ञाएँ नितान्तही स्वच्छ तथा निर्दोष होनी चाहिँएँ वह कलुषित कार्योंके करनेकी आज्ञा कदापि नहीं देगा । वह किसीको धोखा तथा दगा नहीं देता । किसीसे मैत्री वर नहीं रखता । इस प्रकारके कार्य तो मायाके हैं । शुद्ध ब्रह्म कदापि ये काम नहीं