BharatKosha
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 556 of 1367

Read in context
Page 556

नाद, कहाँ बसे ब्रह्म, कहाँ बसे हंस, कहाँ बसे जीव, कहाँ बसे शिव, कहाँ बसे अविनाशी, कहाँ बसे काल ?

अविनाशी वचन—हृदय बसे मन, नाभि बसै पवन, कण्ठ बसै शब्द, श्रवणबसे नाद, नासिका बसे हंस, जिह्वा बसे जीव, नेत्र बसे शिव अकेला बसै अविनाशी और कुबुद्धिमें काल बसता है ।

देवदत्त वचन—हृदय न होता तो कहाँ होता मन, नाभि न होती तो कहाँ होता पवन, कण्ठ न होता तो कहाँ होता शब्द, श्रवण न होता तो कहाँ होता नाद, ब्रह्माण्ड न होता तो कहाँ होता ब्रह्म, नासिका न होती तो कहाँ होता हंस, इंगला न होती तो कहाँ होता शिव, नेत्र न होता तो कहाँ होता निरञ्जन और काया न होती तो काल कहाँ होता ?

अविनाशी वचन—हृदय न होता तो मन निर्नेव होता, नाभि न होती तो शब्द निराकार होता, श्रवण न होता तो नाद निराधार होता, मुख, न होता तो ब्रह्म मध्यमें होता, नासिका न होती तो हंस सत्यमें होता, इङ्गला न होती तो चन्द्रमें जीव होता, पिंगला न होती तो शिव सूर्यमें होता, पुत्र न होता तो निरञ्जन होता, निरन्तर काया न होती तो काल शून्यमें होता ।

देवदत्त वचन—हे स्वामी ! मनका कौन जीव है ? पवनका कौन जीव है कालका कौन जीव है ।

अविनाशी वचन—पवनका जीव शब्द, शब्दका जीव नाद, नादका जीव बीज, बीजका जीव हंस, हंसका जीवना जीव ।

देवदत्त वचन—स्वामी कहाँ से निरञ्जनकी उत्पत्ति है ? कहाँसे पवनकी उत्पत्ति ?

अविनाशी वचन — आदिते सत्य उत्पन्न है । सत्यते तत् उत्पन्न तत्त्वं शब्द । शब्दते उत्पन्न अलेख है । अलेखते उत्पन्न अलील है । अलीलते उत्पन्न निरञ्जन है । निरञ्जनते उत्पन्न शिव है । शिवते उत्पन्न जीव है । जीवते उत्पन्न हंस है । हंसते उत्पन्न ब्रह्म है । ब्रह्मनादते शब्द उत्पन्न है । शब्दते पवन और पवनते मन उत्पन्न है ।

देवदत्त वचन—हे स्वामी ! तन छूटे मन कहाँ समाना, पवन कहाँ समाना, शब्द कहाँ समाना, नाद कहाँ समाना, ब्रह्म कहाँ समाना, हंस कहाँ समाना, जीव, कहाँ समाना, निरञ्जन कहाँ समाना और अलील कहाँ समाना है ।

अविनाशी वचन—तन छूटे मन पवनमें समाना, पवन शब्दमें समाना, शब्द नादमें समाना, नाद ब्रह्ममें समाना, ब्रह्म हंसमें समाना, हंस जीवमें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · Page 556 of 1367 · BharatKosha