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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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इस प्रकार श्रीकृष्णने जब गरुड़को आज्ञा दी कि, तुम कबीर सहाबको गुरु करो, तब गरुड़जी तुरन्त सत्यगुरुके पास गये । कबीर साहबकी आज्ञानुसार दीक्षा लेनेका सब प्रबंध किया । जैसा कि, अब वर्तमान कालमें कबीर पंथियोंमें दीक्षा लेनेकी प्रथा है । इसी नियमके अनुसार गरुड़जीने चारों ओर पत्र भेजकर बहुत साधुओंको एकत्रित कर भण्डारेका बड़ा प्रबंध किया । समस्त साधुमंडलिका प्रेम पूर्वक सेवा सत्कार किया ।

चौपाई—जितने साधु द्वारिका चीन्हू । तिनिहिं गरुड़ सबको दल दीन्हू ॥

जहैं लगि मुनिवर सहस अठासी । आए ऋषि मुनि सिद्ध चौरासी ॥

आए ऋषि जो सहस अठासी । नागलोकके भोग विलासी ॥

वासुदेव जहैं आप रहाये । और नाग बहुतेक चलि आये ॥

ब्रह्मा विष्णु जहैं आये भाई । शिव आये बहुतेक चलि लुगाई ॥

महादेव वचन ।

कह शिव कोपके वचन अपारा । तीन छोड़ कस और विचारा ॥

सब पर तेज महादेव कीन्हू । सब मिलिआय गरुड़को चीन्हू ॥

तब शिव ऐसे वचन सुनाई । हमें तीनों पर और न भाई ॥

गरुड़ वचन ।

सुनु ब्रह्मा सुनु विष्णु महेशा । मो को कीन्ही कृष्ण उपदेशा ॥

जो कछु कृष्ण बताई भेखा । सो तुम्हरो मत आखिन देखा ॥

महादेव वचन ।

यह सुनि महादेव रिसियाना । हमरी गति तुम कैसे जाना ॥

हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमें छोड़ कस और दूढ़ाई ॥

शिवजी बहुत कुछ कह अत्यंत क्रुद्ध हुए बड़ा भय दिखलाया ।

पर गरुड़जीने कुछ भी परवाह नहीं की, ब्रह्मा विष्णु आदि सब देवता उपस्थित थे । जब गरुड़जीने कबीर साहबसे दीक्षा ली, सत्यगुरुका ज्ञान पाकर भली प्रकार सन्तुष्ट हुए, गरुड़जीके सामने बहुतसे लोग ब्रह्मा विष्णु तथा शिव सहित एकत्रित हुए, पर किसकी ताकत थी कि, ज्ञानमें गरुड़जीका सामना कर सके ।

जिस समय गरुड़जी दीक्षालेने लगे उस समयका वृत्तान्त सुनो कि, उनपर कैसी आकाशी दया हुई थी ।

चौ०—ऐसी भाँति भगति उन साजा । बाजे सकल अनाहद बाजा ॥

बाजे शंख बीन शहनाई । गैवको बाजा बाजै भाई ॥