कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextअन्न पानि नहिं ग्रासहीं, दिन दिन बाढे अङ्ग ।
नारि पुरुष दोउ हरषिया, चडे, सवाया रङ्ग ॥
महादेव तेहि अवसर, जात रहे कैलास ।
नीमा पग धरि बूझही, पूजी मनकी आश ॥
तू नीमा बड भागिनी, पूर्व जन्म तप कीन्ह ।
तोरें घर प्रभु आइया, हँसि प्रभु दर्शन दीन्ह ॥
अक्षय वृक्ष फल पायके, सुख सम्पत्ति परिवार ।
दे भाँवर बर पूजले, गावें मङ्गल चार, ॥
धरमदास बर पावल, आपन रह्यो निनार ।
साहब कबीर जूको मङ्गल, गावें सुरति सम्हार ॥
तात्पर्य — जब कबीर साहब पहले चँदबारेमें प्रगट हुए थे जिसका कि, विवरण में पहिले कर आया हूँ, उस समय पहले कबीर साहब चन्दन साहूकार की स्त्रीको मिलें उस स्त्रीके भी कोई सन्तान नहीं थी । तब चन्दन साहूकारने अपनी दासीके हाथोंसे फिर उसी तालाबमें फिकवा दिया । उसके पीछे लक्ष्मणा ब्राह्मणीको मिले जैसा कि, अनुरागसागरमें दिखा है । इसके बाद नीमा और नीरू जुलाहेके घर आये । उस समय शिवजी महाराज कैलाशको जाते थे, वे नीमाके समीप जाकर कहने लगे—ऐ नीमा ! तू धन्य है ! बड़ी भाग्यवती है कि, स्वयम् साहब तेरे घर आये ।
यह सब वार्ता धर्मदास साहब और रामानन्द स्वामी इत्यादि सभी हंस लोग कहते चले आ रहे हैं यही बात गरीबदासजीने भी कही है; वे सब सर्वज्ञता के बलसे कहते आते हैं । ये बातें देखने तथा पढ़ने सुननेकी नहीं हैं । कबीर साहब जब जैसे काशीके लहर तालाबमें प्रगट हुए थे उसी तरह चँदबारेके तालाबमें तथा नरहर ब्राह्मण और लक्ष्मणा ब्राह्मणीके घर गये । चँदबारे तालाबकी वही शोभा थी जो काशीके लहर तालाबकी थी । इसी प्रकार कबीर साहब नरहर ब्राह्मणके घरमें जाकर रहे ।
महाराजा वीरसिंह ।
पृ. ३०० में लिख चुके हैं कि, कबीर साहबकी अन्त्येष्टि किया हिन्दू-रीतिके अनुसार करनेके लिये वीर सिंहजी वधेले मगहरके पठानसे लडने पहुँचे थे उन्हें कैसे बोध हुआ इस विषयपर वीरसिंह बोध एक ग्रन्थ है जो कबीर सागर नं० ४ बोधसागरमें सामिल है, उसके कुछ-बचनोंको वहीं उद्धृत करते हैं —