कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextचौ० – बीरसिंह देव बघेला राजा । बैठे आनि महल चढ़ि छाजा ॥
राजा नजर सबनपै कीन्हा । सब बडे भाव भक्ति चित दीन्हा ॥
गावैं भक्त अनन्त व्यवहारा । एक भक्त कस बैठा न्यारा ॥
टोपी एक अनूपम दीन्है । माला तिलक कूवरी लीहे ॥
श्वेत स्वरूप भक्तिकी काया । महा अनन्द रूप छबि छाया ॥
राजाबीरसिंह वचन ।
राजा छरीदार हँकराई । नामदेव कहैं आनि बुलाई ॥
वेगसो छरीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥
नामदेव वचन ।
नामदेव पूंछे चितलाई । राव सँग कोई और हे भाई ॥
छरीदार पुनि वचन सुनाइ । कोई नहिं रावके भाई ॥
नामदेव छड़ी हाथमें लियऊ । चलै चले राजापै गयऊ ॥
राजा देख ठाढ़ तब भयऊ । कर गहिंके आशन बैठयऊ ॥
राजाबीरसिंह वचन ।
सा० – भक्ति करो गोविन्दकी, एक चित ध्यान लगाय ॥
श्वेत स्वरूपी भक्त यक, सो कस न्यार रहाय ॥
भावारथ—कबीर साहिब धर्मदासजीसे कह रहे हैं कि, एकवार नामदेव लोटन, रबिदास आदि हरिकीर्तन करते हुए ज्ञानचर्चा कर रहे थे, महाराज वीर सिंहजी भी ऊपर बैठे सुन रहे थे कि, मैं भी वहाँ पहुँच गया पर मैं सबसे अलग बैठा हुआ था इसी पर राजाको सन्देह हुआ था, इसी संदेहको मिटानेके लिये राजा ने छड़ीदारके हाथ नामदेवजीको बुलाया एवं यही प्रश्न किया ।
नामदेव वचन ।
चौ० – राजा सुनहु वचन एक मोरा । हम तुम हरिहर ब्रह्मा दोरा ॥
ता हरि भक्ति करै बहु धासी । कहे एक पुरुष और अविनासी ॥
माला भेष ले साधु शरीरा । डीरा जोलाहा दास कबीरा ॥
कृत्रिम कहे सकल सब देवा । कहीं सौंच नहिं देखूं सेवा ॥
ऐसे कहत कबीर जुलाहा । झूठ दिबाना मन हम आहा ॥
साखी – जुलाहा निन्दत सबनको, बन्दत कोही नाहिं ।
झूठ कहत हर ब्रह्मा, कह निर्गुण यक आहिं ॥