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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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स्थान है वहाँ आपके शिष्योंको भी जाना उचित है।” उस समय महात्माके शिष्य अत्यन्त रुष्ट हुए, बड़े चलेने मोलवीकी गरदन पकड़ कर उसका शिर महात्माके चरणोंपर धर कर कहा कि, देख ! करोड़ों मक्के इन चरणोंमें हैं। महात्मा नित्य किया करने गये उस समय मोलवीका उस शिष्यसे बहुत वाद विवाद हुआ। जब महात्मा आये तब मोलवीने शिकायत की। उस समय महात्माने अपने शिष्यको समझाया कि, मक्काके विषयमें मोलवीका कहना बहुत ठीक है। वह पवित्र स्थान दर्शन योग्य है। तू भी मोलवीके साथ मक्काके दर्शनको चला जा। वह शिष्य गुरुमुख था, हाथ बाँध कर खड़ा होगा, उसी समय मोलवीके साथ जहाजपर सवार हो गया। थोड़ी दूर जहाज चला था कि, एक तूफान आया जिससे जहाज टूट गया, सब आदमी डूब गये, पर वह चेला एक तख्ते पर बैठा रह गया, वह भी डूबनेके समीप भी था ही उसी समय समुद्रसे एक हाथ निकलक साथ शब्द हुआ कि, यदि तू अपना हाथ मुझे पकड़ा दे तो मैं तुझको बचालूँ। उस चलेने पूछा कि, आप कौन हो ? फिर शब्द आया कि, मैं पैगम्बर साहब हूँ। उस चलेने जवाब दिया, मैं नहीं जानता कि, पैगम्बर साहब कौन हैं ? मैं केवल अपने गुरु महाराजको जानता हूँ दूसरेसे कुछ सम्बन्ध नहीं रखता। तब वह हाथ छिप गया, वह गुरुमुख तख्तपर बैठा हुआ डूबकी खाता जाता था। कुछ कालके पीछे एक हाथ और निकला, शब्द हुआ कि, मुझे अपना हाथ पकड़ादे तो मैं तुझको बचालूँ। उस चलेने पूछा कि, आप कौन हैं ? तब उत्तर आया, कि मैं स्वयम् परमेश्वर हूँ। गुरुमुखने उत्तर दिया कि, मैं अपने गुरुके सिवाय दूसरे किसीको भी नहीं मानता। मेरा परमेश्वर तो मेरा गुरु है, दूसरे परमेश्वरको मैं नहीं जानता। तब वह हाथ भी छिप गया। कुछ कालके पीछे तीसरा हाथ निकला उसने पुकार कर कहा कि, तू अपना हाथ मुझको पकड़ा मैं तेरा दादा गुरु हूँ। इसने उत्तर दिया कि, मैं अपना हाथ अपने गुरुको पकड़ाऊँगा दूसरेको हाथ कदापि न दूँगा। चाहे जीवित रहूँ या मर जाऊँ। तब वह हाथ भी विलुप्त हो गया। इसके पीछे स्वयम् सत्यगुरु आये। इस शिष्यको हृदयसे लगा लिया उसे तुरंतही अपने स्थान पर लेआये गुरुमुखकी पूरी परीक्षा हो चुकी। सर्व शब्द उन्हीं गुरु महाराजके ही थे। जो शिष्यकी पूर्ण परीक्षाके लिये प्रकट किये थे। इस कथनका परिणाम यह है कि, चाहें कोई किसी भी प्रकारके तीर्थ व्रत करे दान पुण्य यात्रा कर्म उपासना ज्ञानकी पूर्णता प्राप्त करे, कठिनसे कठिन तपस्या करे शुभकर्मोंको सीमा पर्यन्त पहुँचावे परन्तु मुक्ति केवल गुरुमुखकी ही होगी बाकी सारा संसार भवसागरमें डूब जावेगा।