कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभिन्न पन्थोंके संस्थापक शिष्य गण ।
नानक शाह साहब
नानकशाह साहब कबीर साहबके खास चेलोंमें थे। उनको सत्य गुरुने पञ्जाब प्रान्तकी गुरुवाई प्रदान की थी, उसका जन्म मौजा तिलोंडी जिला लाहौर (पञ्जाबदेशमें) हुआ था। सम्बत् १५२६ विक्रमीमें कालू नामक खत्रीके गृहमें उनका जन्म हुआ। लड़कपनसेही श्रेष्ठताके चिन्ह परिलक्षित थे। जब उनका वयस सोलह वर्षका हुआ तब माताने एक दिवस बीस रुपये देकर कहा कि, इन रुपयोंसे उत्तम सौदा कर लाओ। नानक साहब उन रुपयोंको लेकर चले, आगे एक मण्डली साधुओंकी मिली इसको देखकर इनका हृदय स्वच्छ हुआ सोचा कि, साधुओंको खिलानेसे बहुत अच्छा सौदा हो सकता है वह बीस रुपया जो पासमें था उससे भण्डारा करके उस स्थानपर सब साधुओंको खिला घरको चले गये। फिर जब नानक साहबकी वयस (आयु) अठ्ठाईस वर्षकी हुई तब सम्बत् १५५३ विक्रमीमें उन्होंने बेईनदीके भीतर गोता मारा। तब उस समय आपको जिन्दा बाबा मिले, दूध उपदेश देकर अपना शब्द भली भाँति दृढ़ाया नदीके बाहर निकले तो पञ्जाब देशमें उनकी महिमा फैली। उनके शिष्योंकी लाम लग गई।
नानकशाह साहब तो अपने जीवन भर गुरुके आज्ञाकारी ही होकर सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश किया करते थे। पर नानकशाहके पीछे इस पन्थके लोग कबीर गुरुसे फिर गये इस कारण सत्यपुरुषकी भक्ति और स्वसंवेदकी शिक्षा छूट गई। काल पुरुषकी भक्तिको और लोग झुक पड़े। गुरुके विरुद्ध होनेपर अनेक काल तक उनके पास कोई ग्रंथ नहीं रहा। गुरु अर्जुनजीने सन्तोंकी बाणी एकत्रित करके एक ग्रंथ प्रस्तुत किया जो अबतक उनके पास उपस्थित है। अब वे लोग कबीर साहबको तो अपना गुरु स्वीकार नहीं करते, वरन् अन्यान्य भक्तोंके समान एक भक्त जानते हैं। इस कारण अनेक प्रमाणोंको एकत्रित करता हूँ कि, नानक देवके कबीर साहिबही गुरु थे।
इतिहासिक प्रमाण १—एच. एम. एलफिन्स्टन साहब जो अंग्रेजी इतिहास लिखनेवालोंमें नामी और बहुत बड़े इतिहास लेखक हो गये हैं वह अपने भारतके इतिहासमें इस प्रकार लिखते हुए नानकशाहके विषयमें साक्षी देते हैं कि नानक शाह कबीर साहबके शिष्योंमेंसे एक शिष्य थे। परन्तु उन्होंने अपने लेखमें कोई पृथक् वृत्तान्त कबीर साहबके विषयमें नहीं लिखा है, इसका