कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकाल सुमिरिके डुबकी मारें । खाली रहे अन्त में हारें ॥
वे नहिं पुरुष खोजको पावें । उलट पलट भवसागर आवें ॥
अब यहाँ कबीर साहब नानक साहबसे सब तीर्थ व्रत इत्यादिका विवरण करते हैं कि—विना यथार्थ ज्ञानके सबमें कालपुरुषकी धूर्तता तथा दगाबाजी ही होती है ।
नानक वचन
आगे सुनी न काहू जानी । धन्य कबीर पुरुष तुम ज्ञानी ॥
कालको चक्र कठिन बल जोरा । इतने जीव बचाओ मोरा ॥
बली पुरुष तुम कालको नाथा । अमरलोक मोहिं लेचल साथा ॥
निरङ्कार अब सुमिरौ नाहीं । फेर न जन्मों या जग माहीं ॥
तीनों लोक काल है देवा । जान परा अब हमको भेवा ॥
निर्गुण जपूं न सर्गुण ध्याऊँ । पारपुरुष तुम शरणा पाऊँ ॥
पुरुष पुरान मिले निजपीरा । खेवा मोर लगाओ तीरा ॥
अब यही सत्यगुरुने नानक साहबको अपना शब्द देकर कालपुरुषसे अलग किया है । फिर प्रलयका समस्त वृत्तान्त सुनाके काल पुरुषका सब ढङ्ग प्रगट किया है एवं भली भाँति समझा दिया है कि, हे नानक ! अब तुम पर कालका बल नहीं चलेगा, यदि मेरे पथपर अटल रहे तो ।
नानक वचन
धन्य पुरुष ज्ञानी करतारा । जीवकाज प्रकट संसारा ॥
यहाँ ते गया न साबित कोई । अजर पुरुष तुम निश्चल होई ॥
नाम कबीर जपै जिन जोई । ताकी फेंट न पकरै कोई ॥
धन्य कर्ता प्रभु बन्दी छोरा । ज्ञान तुम्हार महाबल जोरा ॥
दिया दान मोहि किया उबारा । कबहुँ न छोड़ूं शरण तुम्हारा ॥
मैंने सुना है कि, तावरीख अकबरीमें कबीर साहब और नानक साहबके विषयमें बातें अनेक लिखी हैं । दूसरी पुस्तकोंमें भी उपरोक्त बातें लिखी हुई हैं यहाँ तक कि, कितनेही साधुभी इस बातको जानते हैं । नानक शाह साहबको सत्यगुरुने कालपुरुषके देशसे छुड़ा करके अमर कर दिया, नानकजी हंस कबीर हो सुक्ति रूप हो गये, एवं अधिकारी होकर अपनी इच्छानुसार लोककल्याण करते रहे ।
कबीर साहब तो सम्बत् १५७५ विक्रमीमें अन्तर्धान हो गये पर नानक साहब पृथिवीपर अपना धर्म प्रचलित करते हुए सत्यपुरुषकी भक्तिका उप-