कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextजहाँ व्यवपार पिताकर भाई । स्वामी हरिको भक्ति चलाई ॥
छाड़यो देश तज्यो घरबारा । स्वास उसास भजैं करतारा ॥
पुनि सामरको कियो पयाना । बाढी प्रीत विरह अधिकाना ॥
पारब्रह्म ते तारी लागी । गुप्त ज्योति उर अन्तर जागी ॥
झिल मिल नूर तेज निज देखी । जीवन जन्म भो सुफल विशेषी ॥
उपजा अनुभव ज्ञान अपारा । आया कबीर तुरत तेहि वारा ॥
मिले कबीर समाधि जगाई । ब्रह्मानन्द प्रकाश उगाई ॥
पदसे पद साखीसे साखी । रहनि गहनि सबही सो भाखी ॥
निर्गुण ब्रह्मको कियो समाधू । तबही चले कबीर साधू ॥
तुर्ककी राह खोज सब छाडी । हिन्दूकी करनी ते न्यारी ॥
षट् दर्शन से नाही सङ्गा । निसिदिन रहे रामके रङ्गा ॥
स्वाँग भेष पछ पंथ न मानी । पूर्ण ब्रह्म सत्य कर जानी ॥
देवी देव न पूजा पाती । तीरथ ब्रत न सेवा जाती ॥
हिन्दू तुर्कन झगडा कीन्हों । सब काहूको उत्तर दीन्हों ॥
दादूरामजीके ग्रंथों तथा जन्मसाखियोंको देखकर साराहाल मालूम हो जायगा ।
मुझको स्मरण होता है कि, लगभग आठ दस वर्ष बीते होंगे कि, एक मनुष्य मुझसे कहता था कि, अभी मैं दादूरामजीका दर्शन कश्मीरके पर्वतमें करके ही लौट रहा हूँ। परन्तु दादूपंथियोंने भी यथाशक्ति कबीर साहबका नाम छिपानेमें कुछ भी उठानेमें बाकी नहीं छोड़ा है।
शिवनारायणदासजी
शिवनारायणदासजी जातिके राजपूत कसबा चन्दबारा, (परगना जफर आबाद जिला गाजीपूर सूबा इलाहाबाद) के रहनेवाले थे। अंग्रेजी^१^ अधिकारके आरम्भकालमें सत्यगुरुका प्रताप शिवनारायणदास पर प्रगट हुआ, उनके हृदयमें प्रकाश फैल गया, उनका पंथ ससार में प्रचलित हुआ, उन्होंने कई एक ग्रंथभी बनाये थे, जो उनके शिष्योंमें विद्यमान हैं।
अगहन सुदी त्रयोदशी शुक्रवार सम्बत् १७९१ विक्रमी में शिवनारायणदासको सत्यगुरु मिले। उनसे पूछा कि, आपका क्या नाम है। तब सत्यगुरुने कहा कि, मेरा नाम दुःखहरण है। जो कोई दुःखहरणका दर्शन पावेगा उसका
^१^ अंग्रेज लोग उसी समयसे भारतवर्षमें अपनी कला, कौशल और व्यवहारादि जमाने लगे थे, पर उस समय इनका राज्य नहीं हुआ था।