कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 663 of 1367
Read in contextविक्रमी में इन्होंने उपदेश देना आरंभ किया । ये ही पीछे राधास्वामी नामसे प्रसिद्ध हुए ।
मतका सार
इनके मतमें तीन चीज बहुत जरूरी हैं १ गुरु, २ नाम और तीसरे सत्संग उत्तम होना चाहिये । ये तीनों चीजें ही मुक्ति पथको देनेवाली हैं । गुरु सच्चा और पूरा होना चाहिये । दूसरे नाम भी ऊँचा और सच्चा होना चाहिये । सत्संग भी अच्छा और सच्चा होना चाहिये इनके यहाँ अन्तरंग और बहिरंग भेदसे सत्संग दो तरहका होता है । अन्तरंग सत्संगका यही स्वरूप है कि, अपने आत्माको सत्यपुरुषराधास्वामीके चरणोंमें लगा दे । बहिरंग सत्संग सच्चे साधुओंका संग करना है । इस मतमें शब्दकोही सृष्टिका रचयिता मानते हैं तथा शब्द और सुरतिकोही ये ईश्वर कहते हैं ।
इक्कीसवें हिंदायतनामा
सारवचन पृष्ठ ३८९ के इक्कीसवें राधास्वामी वचनमें समस्त स्थानोंको हाल लिखते हैं 'नासूत', 'मलकूत', 'जबरूत', और 'लाहूत' का विवरण करके हाहूतका उल्लेख करते हुये राधास्वामी कहते हैं कि, इस 'हाहूत' स्थानका विवरण सशत जानते हैं अधिक खोलना उचित नहीं समझता । बहुत कालतक उसका भ्रमण मैंने किया । फिर गुरुओंकी आज्ञासे मेरी आत्मा आगे चली ।
अब इस स्थानपर मेरा एक आक्षेप है । उसपर सब बुद्धिमान तथा दूर-दर्शी महाशय गौरके साथ ध्यान दें, कि, जो मनुष्य गुरुको अस्वीकार करता है वो फिर क्यों लिखता है कि, मेरी आत्मा गुरुके आदेशसे आगे चली ? भला जी ! जिसके गुरुही न हो उसको किसके गुरुकी आज्ञा मिलेगी, अपने तो गुरु है ही नहीं, दूसरेके गुरुको गुरु कहते बन नहीं पड़ता क्योंकि, दूसरेके गुरुको क्या गरज पड़ी है कि, वह सहायता करता हुआ मार्ग दिखावे ?
अतः इस स्थानपर उनका वचन मिथ्या हुआ उनका गुरु तो अवश्य है परन्तु उसको वे नहीं मानते । जान पड़ता है कि, या तो अपने गुरुका नाम लेनेमें उन्हें घृणा है या अपनी कुल मय्यर्दाका ध्यान आगया है या यह विचार होगा कि, मेरी श्रेष्ठता तथा बड़प्पनमें बाधा पड़ेगी, किंवा मेरा गुरु तुच्छ है । मैं बड़ाही प्रसिद्ध हूँ । मेरी मान भड़क और चमक दमकमें कुछ हानि होगी । उस गुरुका नाम होगा मेरा न होगा ।
फिर देखो पृष्ठ ३९३ आत्मा अर्थात् सुरति आगे चली । जब उस मैदानके पार पहुँचतेही सत्यलोकका नाका मिला । भलाजी ! बड़ी २ और २