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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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अध्याय १६.

आद्या और निरंजनपर जीत

आद्या और कबीर

जितने अभिमानी और अहंकारी हैं उन सबमें बढ़कर आद्या तथा निरंजन हैं। आद्याका दूसरा नाम आदिभवानी है। इसे कोई कोई विज्ञान प्रकृति कहकर भी याद करते हैं, जब ये बहुत अभिमानमें आयीं एवं सत्यपुरुषको भुलाकर निरंजनके साथ प्रसन्नता पूर्वक रहने लगीं, संसारमें विशेष अन्धेर होने लगा तो सत्यपुरुषकी आज्ञा हुई कि, हे ज्ञानीजी ! तुम जाकर आद्याको समझाओ। क्योंकि, वह बहुत अभिमानी भी होगई है, एवं बहुत जीव हत्या करती हैं। इस बातपर ज्ञानीजी सत्य पुरुषको नमस्कार करके चल दिये और प्रकृतिको जीत कर दिखा दिया। यह प्रकरण अम्बुसागरके नवम तरंगमें लिखा है कि—कबीर साहिब धर्म-वासजीको सुनाते है कि, मुझे सत्यपुरुषने आज्ञा दी कि, आद्या जीबोको सत्ता रही है इस कारण तुम आद्याके पास जाकर आद्याको समझा दो। सत्यपुरुषकी आज्ञाके अनुसार कबीर साहब आद्याके धामपर गये। द्वार पर खड़े होकर द्वारपालोंसे कहा कि, आदिभवानी से मेरा आनेका समाचार कहो। द्वारपालोंने आद्याको समाचार दिया, उसने कबीर साहबको अपने दरबारमें बुलाया। जब साहब भीतर गये तब आद्याने पूछा कि, आप कौन हो कहाँसे आये हो ? तब कबीर साहब ने उत्तर दिया कि, मैं सत्यलोकसे आया हूँ और सत्यपुरुषने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, क्योंकि, संसारमें तुमने बड़ा अत्याचार तथा अन्धेर मचा रखा है। जब (दुर्गापूजा) दशहरा आता है तब भैंसा बकरा आदि कटवाती हो भांति भांति के फन्दे लगाकर मनुष्यको तुमने बन्धनमें डाल दिया है। तेरे फंदेमें फँसकर सब जीव मरते और दुःख पाते हैं। मूर्ख तथा बुद्धिहीन मनुष्य सत्यगुरुक शब्दको न मानकर तेरी फाँसीमें पड़ते हैं। तू सत्यगुरुकी चोर है। मैं तुझको बांधकर एक पलमें रसातल भेज दूँगा, यह सुनकर देवी कहने लगी कि—

चौ०—कह देवी तू कैसे बोले। शक्ति हमारी घर घर डोले॥
पुरुष तुम्हार में नहिं डरऊँ। तीनों लोक पाँव तर धरऊँ॥
तुमको मारूँ चाँपू हेठा। तीन लोक पसरी मम डेठा॥
ब्रह्मा विष्णु हाथ सब मोरे। शिव सनकादिकके बल तोरे॥
चौसठ लाख कामिनी होई। मेरे सङ्ग विचर सब सोई॥
तुम्हरे हंस कहाँ चलि आवा। केहि कारनतोहिपुरुष पठावा॥