BharatKosha
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 678 of 1367

Read in context
Page 678

साखी पद कोटिन बहु वाणी । पुरुष एकको सुमिरौ प्राणी ॥
ज्ञान सुरति औ शब्द अपारा । यह सब दिया तब किया पसारा ।
अचल पुरुष सुमिरे जो कोई । जीवितमुक्ति^१^ तासुकी होई ॥
साखी पद बोले बहु वाणी । आदिनाम कोई विरला जानी ॥

साखी—कहैं कबीर निज नाम विनु, मिथ्या जन्म गवौंय ।

निर्भय मुक्ति निःअक्षर^२^, गुरु विनु कबहुँ न पाय ॥

चौ०—अगम अगोचर अति व्यवहारा । कहन सुननसे होवैं पारा ।

यह धन राखि जीवकी नौई । करो बणिज टोटा कछु नाहीं ॥

यह पूँजी है अगम अपारा । खरचै खाय बडे विस्तारा ॥

यह धन मिले जब भाग बडेरा । धन सञ्चित गाँहक भितेरा ॥

साखी—पूँजी मेरा नाम है, जाते सदा निहाल ।

कहैं कबीर जो पुरुष बल, चोरी करै न काल ॥

चौ०—जो जो जिव निज नामहि जाना । भये मुक्त सो पुरुष समाना ॥

सोई जीव हंसका लेखा । अक्षर में निःअक्षर देखा ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मदास दास के दासा । सद्गुरु मेटो मेरी आसा ॥

नाम निःअक्षर केहि उत्पाना^४^ । अकथ कथा तब कैसै जाना ॥

सत्यगुरु वचन

कह कबीर सुन धर्मनि बानी । अकथ कथा तोहि कहूँ बखानी ॥

तब नहि लोक वेद वस्तारा । तब नहि कूरम नहि संसारा ॥

नहि तब धरणी अमर सुमेरु । नहि तब हते जो इन्द्र कुबेरु ॥

तब नहि सृष्टी सकल पसारा । आप आप थे अकह निनारा ॥

सकल सृष्टि उत्पति कछु नाहीं । तब सब रहे अकहके माहीं ॥

होते आप तब शब्द न सवाला । इच्छा भई तब कीन्ह उँजाला^५^ ॥

इच्छाते अनहद^६^ धुनि बानी । सुरति सम्हार सृष्टि उत्पानी ॥

इच्छा अनुभव शब्द उपाना । सुरति^७^ निरति ता मांहि समाना ॥

तबते अच्छर भेद बिचारा । साखी शब्द कीन संसारा ॥

अकह अचल पुरुष तेहि आपू । नहीं तहां दुःख सन्तापू ॥

सबका मूल वाहि सो लागा । उलटसमाय होई बड़ भागा ॥

निर्भय हो सो करे गुरवाई । गुप्त मता में कहूँ समझाई ॥

१ जीवनमुक्ति, २ रामनाम, ३ अक्षर रहित, ४ उत्पन्न किया, ५ प्रकाश, ६ पराध्वनि या दशमध्वनि, ७ अजपा जापभी ।