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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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जिस किसीने पाया उसीसे पाया और दूसरा कोई गुरु इस पृथिवीपर नहीं कि, उस सारशब्दका पता देसके, संसारी मनुष्य तो जानतेही नहीं कि, सारशब्द क्या पदार्थ है ? कहाँ है, किस प्रकार किस गुरुके द्वारा प्राप्त हो सकता है ? शब्दको तो सब मानते हैं परन्तु सार शब्दको कोई नहीं जानता । शब्द तथा वाक्यादि तो मन इन्द्रीकी पकड़में आता है परन्तु सारशब्द तो मन इन्द्रीकी पकड़के नितान्त बाहरकी बात है ।

मनुष्य बेचारा क्या करे मन इन्द्री आदि तो सब मिथ्या हैं उनके साथ यह भी बिलकुल मिथ्याका रूप बना हुआ है सत्यताको कैसे स्वीकार कर सकेगा क्योंकि, जब यह सत्यकी ओर झुकता है तो देह और जगत सब छोड़ना पड़ता है । मिथ्याकी ओर मनको फेरता है तो सच्चाईकी सूरत भी दिखाई नहीं देती, आखेट उसके हाथ नहीं आती । यह अपने शरीरके भयसे गहरे जलमें गोता नहीं मारता । जबतक गहरे जलमें गोता न मारे तबतक वह सफल मनोरथ न होगा । देखो कैसे कैसे बादशाह लोग और सिद्ध साधुगण कबीर साहबके शिष्य हुये उन सबोंने सांसारिक धन देह तथा संसारकी सर्व मामग्रियोंको तृणके समान तथा घृणित वस्तु समझकर त्याग दिया । जिन लोगोंने संसारसे प्रेम किया वे फँसे रहे यह संसार झूठा है उसके बनानेवालेकी जादूगरीका खेल है । जो कोई इस खेलमें फँसा हुआ है उसको कदापि सत्यता दिखाई न देगी । यदि मनुष्योंको प्रत्यक्षमें सत्यका स्वरूप दिखाई देता तो वे मिथ्याको भी स्वीकार न करते । सत्यताका यथार्थ स्वरूप छिपा रहनेके कारण लोग मिथ्याको सत्य करके मान रहे हैं झूठकोही सत्य जान रहे हैं यदि सत्य प्रत्यक्ष होता तो संसार न होता । जैसे सूर्यके सामने रात नहीं ठहरती इसी प्रकार सत्यके सामने मिथ्या नहीं ठहर सकती ।

इस पृथिवीपर जितने मनुष्य हैं सो सबके सब वृत्तपरस्त^१^ हैं । कोई परमेश्वरकी पूजा नहीं जानता, जिसको कबीर साहबने परमेश्वरकी पूजा सिखाई है वही परमेश्वर पूजक हुआ है शेष सब बुतपर हैं । जितने लौकिक नाम हैं वे सब उसी मूर्तिके हैं कोई परमेश्वरका नाम नहीं जानता परमेश्वरका नाम वही जानेगा जिसको स्वयम् कबीर साहब बतावें । जितनी सांसारिक भजन तपस्यायें हैं वे सब विषय भोगके लिये की जाती हैं । जितने फल, दान,


^१^ सत्य पुरुष परमात्मासे अतिरिक्त जो कुछ है उसको वृत्त कहते हैं उसके माननेवालेको वृत्तपरस्त कहते हैं । यद्यपि मुसलमान या दूसरे धर्मवाले हिन्दुओंको वृत्तपरस्त कहते हैं, परन्तु विचार करके देखा जाय तो सभी मतोंवाले वृत्तपरस्त ठहरेंगे जो विषय वासनाके वश हो स्त्री आदि व्यभिचारके साधनोंमें लगे रहते हैं वे एक राग मानके वशमें हैं ।