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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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कबीर साहबकी साखी मनको अङ्क ।
कबीर-मनके म'ते न चालिये, छोड़ि जीवकी वान^१^ ।
कत'वारीके तार ज्यों, उलट अपौठा^२^ ठान ॥
कबीर-चिन्ता चित्त बिसारिये, फिर बुझिये नहिं कोय ।
इन्द्रा^३^पसर निवारिये, सहज मिलेगा सोय ॥
कबीर-हिरदे भीतर आरसी, मुंह देखा नहिं जाय ।
मुखतो तबही देखि है, जो दिलकी दुविधा जाय ॥
कबीर-मन गोरख मन गोविन्दा, मनही औघड होय ।
जो मन राखे जतन करि, तो आपै करता सोय ॥
कबीर-जो मन गाफिल हुआ, तो सुमिरन लागे नाहिं ॥
धनी सहेगा शास^४^ना, यमके दरगह माहिं ॥
कबीर-कोट करम पल में कटे, यह मन विषया स्वाद ।
सद्गुरु शब्द माना नहीं, जन्म गँवायो बाद ॥
कबीर-कागज केरी नावरी, पानी केरी गङ्ग ।
कहैं कबीर कैसे तरे, पाँच कुसंझी सङ्ग ॥
कबीर-यह मन पंछी हो उड़ा, बहुतक चढ़ा अकाश ॥
वहाँ ही से झट गिर पड़ा, मन मायाके पास ॥
कबीर-भक्ति द्वारा सांकारा, राई दशवें भाय ।
मन तो मैगल हो रहा, क्यों कर सके समय ॥
कबीर-कर्ता था तो क्यों रहा, अब का क्यों पछताय ।
बोया पेड़ बबूलका, आम कहाँ से खाय ॥
कबीर-काया देवल मन ध्वजा, विषय लहर फहराय ।
मन चाले देवल चले, ताका सर्वस जाय ॥
कबीर-मनका मनोरथ छोड़ दे, तेरा किया नहिं होय ।
पानीमें घिब नीकसे, रूखा खाय न कोय ॥
कबीर-काया कसू कमान ज्यों, पाँच तत्व कर बान ।
मारूँ तो मन मृगाको, नहीं तो मिथ्या जान ॥

गजल ।

तु दिल है याकि तूही खुद खुदा है । बहर रख तुम्ही तौ सूरतो सदा है ॥
तुम्ही साहब तुम्ही बन्दःहुआ है । तुम्ही साफी तुही गन्दःहुआ है ॥

१ मूताबिक, २ स्वभाव, ३ कतली, ४ भिन्न, ५ विषयस्पर्श ६ दण्ड, ७ पाँच विषयोंके इच्छुक इन्द्रिय ।