BharatKosha
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 776 of 1367

Read in context
Page 776

१२- (१२९) जबूरकी (१५) और (१६) आयतमें लिखा है कि, जब मैं परदेमें बनाया जाता था तब मेरा स्वरूप तुझसे छिपा नहीं था। तेरी आंखों ने मेरे कुट्टुङ्गे सांचेको देखा तेरेही दफ्तरमें सब बातें लिखी गईं। उनके हृदयोंका हाल है कि, कब सुनंगे उनमेंसे कोई न था। इससे प्रारब्ध और प्रारब्धसे आवागमन प्रमाणित होता है।

१३-वायजकी किताब (६) बाब और (६) आयतमें लिखा है कि यद्यपि वह दूना एक सहस्र वर्ष जीवित रहा तो भी उसने कुछ विशेषता न देखी। क्या सबके सब एकही स्थानमें नहीं जाते ?

तात्पर्य-सबके सब एकही स्थानमें जाते हैं। वह एक स्थान मातृगर्भ है सर्व जीव मातृगर्भमें प्रवेशकर चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं। क्योंकि, जब कोई जीव मर जाता है तब अपनी देह छोड़कर दूसरा चोला धारण करता है, सब जीव एकस्थानमें कदापि नहीं जाते वरन् भिन्न भिन्न स्थानोंको जाते हैं। कोई नरक, कोई वैकुण्ठ तथा कोई मध्यमें ही रह जाता है पर एक स्थान पर सबका जाना सम्भव नहीं है। इससे स्पष्टरूपसे प्रमाणित होता है कि, सबके सब मातृगर्भमें आवागमन किया करते हैं। वही एक स्थान सबके लिये नियत है। यदि कोई कहे कि, वह एक स्थान पृथ्वी है तो यह बात भी कदापि नहीं है। क्योंकि, मिट्टीमें तो मिट्टी मिल जाती है। आत्मा तथा शेषतत्त्व मिट्टीमें नहीं मिल सकते। अतः एक स्थान गर्भमें जानेके अतिरिक्त और कोई नहीं है कि, जहां कर्म कल्मष युक्त जीव जाया करता हो।

सुलेमानके बाबमें ईश्वरी प्रेमकी झलक

१४-सुलेमानके गजलुलगजलातके (३) बाब (४) आयतमें लिखा है कि, अपने पलंगपर मैंने उसको दूँढ़ा जिसको कि, मेरा जी चाहता है मैंने उसको दूँढ़ा पर वह नहीं मिला। अब मैं उठूँगी और नगरकी गलियों तथा सड़कोंपर फिरूँगी उसको दूँढ़ूँगी जिसको मेरा जी चाहता है मैंने उसको दूँढ़ा पर वह न पाया। जो नाकेबन्दी नगरमें फिरते हैं मुझको मिले। क्या तुमने उसको देखा जिसको मेरा जी चाहता है। जब मैं दुःखी होकर उससे बढ़ गयी थी वह जिसको मेरा मन चाहता है मिला। मैंने उसको पकड़ रखा है उसे न छोड़ूँगी जब तक कि, मैं अपने माताके घर न लेजाऊँ।

तात्पर्य-उसको अपने पलंगपर मैंने दूँढ़ा जिसको मेरा जी चाहता है। अन्धकारमय रजनी अज्ञानकी निशामें अपने मनके पलंगपर दूँढ़ा पर वह नहीं पाया। क्योंकि, प्रकाश नहीं था। अब मैं नगरकी गलियोंमें फिरूँगी यह देह नगर