कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextईर्षा हो आई नरकसे उस अमीरने पुकारकर कहा कि, ऐ मेरे पिता! ऐ मेरे पिता !! ऐ इबराहीम !!! तू कृपा करके लाजरको मेरे समीप भेज दे । क्योंकि, मैं नरककी अग्निसे जल रहा हूँ, यदि लाजर मेरे समीप आवे मेरे मुंहमें उंगली दे तो मेरे शरीरकी जलन कम हो जाय । यह बात सुनकर इबराहीमने उत्तर दिया कि, ऐ पुत्र ! तूने संसारमें बड़े बड़े सुख भोगे हैं, लाजरने केवल दुःखही दुःख उठाया है । अब इसकी पारी सुखभोगने तथा तेरी दुःख उठाने की है उस नरकके अमीरने कहा कि, ऐ पिता ! लाजरको संसारमें भेज दे कि, वह जाकर मेरे भाइयोंको समाचार दे कि मैं तो नरकमें आ पड़ा, अब वे लोग किसी तरहका पाप न करें, पुण्यमें चित्त लगावें, ऐसा न हो कि, उनको भी नरकमें आना पड़े । वह बात सुनकर इबराहीमने उत्तर दिया कि, मूसा वहाँ उपस्थित है, यदि लोग उसकी बातें मानेंगे तो वे नरकमें न पड़ेंगे । उस नरकमेंके रईसने कहा कि, यदि मुरदोंमें से कोई जीवित होकर जावे संसारमें समाचार दे तो वे लोग कदापि दुष्कर्म न करेंगे, पर मूसाकी बातका उनको विश्वास न होगा । इस कारण लाजरको भेजना आवश्यक है । तब इबराहीमने उत्तर दिया कि, यदि उनको मूसाकी बातोंका विश्वास न होगा तो वे लाजरकी बातें भी नहीं मानेंगे ।
अब इस लाजरकी कहानीसे नरक तथा वैकुण्ठका जाना क्यामतके पहिलेसे प्रचलित होना प्रमाणित हो चुका । फिर महाप्रलयमें भलों और बुरोंके हिंसाबकी क्या आवश्यकता । केवल भ्रम तथा धोखा है । जिस समय कोई मरता है उसके लिये वैकुण्ठ, नरक तथा अन्यलोक उसी समय मिलते हैं, दूसरी क्यामत और हशरगाहके समयकी कोई आवश्यकता नहीं जब भलाई बुराईका हिंसाब हुआ तब आवागमन स्वतः ही सिद्ध होगया ।
२२-आवागमनपर कुरान-कुरानमें सुरतआराफ (८) सिपारा (४) रकूअ (२९) आयतमें लिखा है कि, तू कह मेरे रबने फरमाई दीनदारी और सीधे करो अपना मुंह हर एक नामजके समय केवल उसीके आज्ञाकारी होकर उसको पुकारो । जैसा तुमको पहली बेर बनाया फेर बनोगे ।
२३-कुरान सूरत नखल (१४) सिपारा (८) रकूअ (६५) आयतमें लिखा है कि, और अल्लाःने उतारा आकाशसे जल, फिर उससे जिलाया पृथ्वीको इससे मरने पीछे उसमें देते हैं उन लोगोंका जो मुनते हैं ।
अब इस आयतसे पृथ्वीका दूसरी बार पुनः जलसे प्रगट होना स्पष्ट होता है । उसमें पते हैं उनको जो मुनते हैं इससे तात्पर्य उन मनुष्योंसे है जिनका हृदय प्रकाशित है कि, पृथ्वीके पूर्व तथा वर्तमान अवस्थाओंसे विज्ञ हैं ।