कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextराजा रावण सीताजीको चुराये लिये जाता था, सीताजी ढाड़े मार मारके रोती हुई राम राम करती जाती थी । जटायुने पहचाना कि, महाराजा रामचन्द्रजीकी स्त्री सीताजीको रावण लिये जाता है, वह दौड़ कर पहुँचा ललकारा कहा कि, दुष्ट रावण ! तू सीता माताको कहाँ लिये जाता है । सावधान खड़ा हो, दोनोंमें महायुद्ध होने लगा । जटायुने रावणको अचेत कर दिया, उसके रथको तोड़ डाला, सीताजीको छीन लिया । रावणने देखा कि, यह बहुत बलिष्ठ वंरी है किसी प्रकार नहीं मरता तो अग्निबाणसे मारा । जटायुके समस्त पर भस्म हो गये, राम २ कहकर वह पृथिवीपर गिर पड़ा तो रावण सीताको रथपर चढ़ा लङ्काको ले गया । रामचन्द्र तथा लक्ष्मणजी सीताको ढूंढते हुये उसी जगह पहुँचे जहाँ कि, जटायु पड़ा हुआ था । रामचन्द्रने पूछा कि तुम्हारी यह क्या दशा है ? जटायुने सारा हाल कहा कि, रावण मेरी ऐसी दशा करके सीताजीको लेगया । रामचन्द्रसे यह बात कहकर जटायु मर गया, रामचन्द्रजी महाराजने जटायुकी किया कर्म अपने हाथोंसे उसी प्रकार किये जैसे अपने प्यारे मित्र अथवा निकटस्थ सम्बन्धीकी किया करते हैं, भगवान् रामकी कृपासे जटायु दिव्यधामको चला गया ।
उक्ताब ।
यह बहुत सुन्दर तथा अत्यन्त बलिष्ठ होता है । यह दक्षिणी अमेरिकामें होता है जिस प्रकार मैंने फिरोजकी सन्तानकी बात लिखी है वैसेही उसकी भी है । यह जब आखेटके ऊपर आता है उस समय सारे मांसभक्षी पक्षी घेरा बांधकर दूर खड़े रहते हैं । जब तक यह राजा मांस खाकर पृथक न हो जाय तब तक कोई भी नीच जातिका मांसाहारी पक्षी आखेटके समीप नहीं जाता, यह भी सुदृढ़ तथा सुन्दर होता है ।
लगलग ।
व्यर्थका द्वेष—जीनबर्ग कालेजके घेरावके भीतर एक घरेला लगलग रहता था उसके निकटके घरके ऊपर एक घोंसला था । उसमें प्रत्येक वर्ष लगलग आया करते थे, अण्डे देकर पालते थे । एक दिन कालेजके लड़केने उस घोंसलेके पास आकर बन्दूक मारी, घोंसलेमें बैठा हुआ लगलग आहत हुआ । क्योंकि इसके बाद वह लगलग कई सप्ताह तक बाहर उड़ता दिखाई न दिया । अपने नियत समयपर दूसरे साथियोंके साथ चल दिया । इसके पीछे वसन्त ऋतुके आरम्भमें एक लगलग कालेजकी छत पर दिखाई दिया, वह परोंको खड़खड़ाता था शायद वह परोंके शब्दसे घरौवे लगलगको बुलाता था । पर घरौवे लगलगने