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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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तृतीय अध्याय ] [ २७७ त्व गारुडमिद चाश्व कामग बहुरूपिणम् । शुकमेतञ्च सर्वज्ञ मया दत्त गृहाण भो ।२५। भगवान् कल्कि का स्तोत्र सुन कर सर्वात्मा भगवान् शङ्कर पार्वती सहित साक्षात् रूप मे प्रकट हुये-उन्होने आनन्दित होकर भगवान् कल्कि के देह पर कर स्पर्श करते हुए घोर मुसकराते हुए कहा-हे श्रेष्ठ ! अपना इच्छित वर मागो ।२१-२२। तुम्हारे द्वारा रचित इस स्तोत्र का का भू-मण्डल मे जो भी कोई पाठ करेगा, उसकी इहलौ- किक और पारलौकिक सभी कामनाएँ पूर्ण होगी ।२३। इस स्तोत्र के पढने सुनने से विद्यार्थी को विद्या, धर्मार्थी को धर्म और अन्य कामना वाले को उसकी उसी कामना की प्राप्ति होती है ।२४। हे कल्कि ! मैं तुम्हे यह शीघ्रगामी, अनेक रूप धारी, गरुड़ अश्व युक्त सर्वज्ञ शुक प्रदान करता हूँ, इन्हे ग्रहण करो ।२५। सर्व शास्त्रास्त्रविद्वास सर्व वेदार्थपारगम् । जयिन सर्वभूताना त्वां वदिष्यन्ति मानवा ।२६। रत्नत्सरु करालञ्च करवालं महाप्रभम् । गृहाण गुरुभारायाः पृथिव्या भारसाधनम् ।२७। इति तद्वच आश्रुत्य नमस्कृत्य महेश्वरम् । शम्बलग्राममगमत् तुरगेण त्वरान्वितः ।२८। पितरं मातर भ्रातृन् नमस्कृत्य यथाविधि । सर्व तद्वर्णयामास जामदग्न्यस्य भाषितम् ।२६। शिवस्य वरदानञ्च कथयित्वा शुभा कथा । कल्किः परमतेजस्वी ज्ञातिभ्योऽथवदन्मुदा । हे कल्कि ! मनुष्यो मे तुम सर्व शास्त्रज्ञ, सर्व शस्त्रास्त्र विशारद, सर्व वेदो मे पारगामी एव सर्व भूतो मे विजयी कहे आओगे ।२६। यह रत्नत्सरु नामक महा कराल, अत्यन्त चमकती हुई, अत्यन्त भारी और पृथिवी के भार को सँभालने वाली तलवार ग्रहण