BharatKosha
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

Page 26 of 259

Read in context
Page 26

तृतीय अध्याय ] [ २७६ असत्य और अधर्म के वशज भय से दुःखित होकर वहाँ से पलायन कर गये ।३५। जैत्रं तुरगमारुह्य खड्गञ्च विमलप्रभम् । दशितं, सशरं चापं गृहीत्वागात् पुराद्वहि ।३६। विशाखयूपभूपालः प्रायात् साधुजनप्रियः । कल्कि द्रष्टु हरेरंशाविर्भूतञ्च शम्भले ।३७। कवि प्राज्ञ सुमन्तञ्च पुरस्कृत्य महाप्रभुम् । गार्ग्य-भर्ग्य विशालैश्च ज्ञातिभि परिवारितम् ।३८। विशाखयूपो ददृशे चन्द्र तारागणैरिव । पुराद्बहि सुरैर्यद्वन्दिन्द्रमुच्चैःश्रव स्थितम् ।३६। विशाखयूपोऽवनतः सप्रहृष्टतनूरूहः । कल्केरालोकनात् सद्यः पूर्णात्मा वैष्णवोऽभवत् ।४०। भगवान् कल्कि तीक्ष्ण तलवार, धनुष और श्रेष्ठ बाणो को धारण कर शिव-प्रदत्त अश्व पर आरूढ होकर नगरी से बाहर चल दिये ।३६। सत जनो से स्नेह करने वाले विशाखयूप नरेश शभल ग्राम में अव- तरित भगवान् के दर्शनार्थ उपस्थित हुए ।३७। उस समय अत्यन्त प्रभाव वाले कवि प्राज्ञ, सुमन्त्र और गार्ग्य विशालादि से घिरे हुए तथा तारागण सहित चन्द्रमा और देवताओं सहित उच्चैःश्रवा के समान अश्व पर चढे कल्कि भगवान् को विशाखयूप नरेश ने नगर के बाहर निकलते देखा ।३८-३६। कल्कि भगवान को देखते ही रोमाञ्चित हुए राजा झुकते हुए पूर्ण वैष्णवत्व को प्राप्त होगया ।४०। सह राज्ञा वसन् कल्कि धर्मोनाह पुरोदितान् । ब्राह्मणाक्षत्रियविशामाश्रमाणां समासतः ।४१। ममाशान् कलिविभ्रष्टानिति मज्जन्मसङ्गतान् । राजसूयाश्वमेधाभ्यां मा यजस्व समाहितः ।४२। अयमेव परो लोको धर्मश्चाह सनातनः । कालस्वभावसस्काराः कर्मानुगतयो मम ।४३।