BharatKosha
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

Page 32 of 259

Read in context
Page 32

कलिकपुराण ] [ २८५ देवता ब्राह्मण श्रेष्ठ वनशो के द्वारा वन्दनीय हैं ।२३। ज्ञानवृद्ध और ब्राह्मणो के बालको के प्रति मैं अत्यन्त प्रेम करता और उनके वचन पालनार्थ ही अवतार धारण करता हूँ ।२४। सभी पापो का नाशक, कलि काल के दोषो का हरण करने वाला ब्राह्मणो के महाभाग्य रूपी चरित्र को सुनने से सदा सब भय नष्ट हो जाते हैं ।२५। इति कलिकवचः श्रुत्वा कलिदोषविनाशनम् । प्रणम्य तं शुद्धमनाः प्रययौ वैष्णवाग्रणीः ।२६। गते राजानि सन्ध्यायां शिवदत्तशुको बुधः । चरित्वा कलिकनुगतः स्तुत्वा तं पुरतः स्थितः ६७। तं शुकं प्राह कलिकस्तु सस्मितं स्तुतिपाठकम् । स्वागतं भवता कस्मात् देशात् किं खादितं ततः ।२८। शृणु नाथ ! वचो मह्यं कौतूहलसमन्वितम् । अहं गंतश्च जलधेर्मध्ये सिंहल संज्ञके ।२६। यथा वृत्तं द्वीप गते तच्चित्रं श्रवणप्रियम् । बृहद्रथस्य नृपतेः कन्यायाश्चरितामृतम् ।३०। कलियुग के दोषो को नष्ट करने वाले भगवान् कलिक के वचन सुनकर पवित्र हृदय वैष्णव श्रेष्ठ राजा उन्हें प्रणाम करके चला गया ।२६। राजा के चले जाने पर शिव प्रदत्त ज्ञानी शुक संध्या के समय भ्रमण से लौटकर भगवान् कलिक के समक्ष स्तुति करके खड़ा हुआ । उनके स्तोत्र-पाठ को सुन कर कलिक भगवान् बोले—तुम किधर से आ रहे हो ? तुमने वहाँ क्या भोजन किया ? शुक बोला—हे नाथ ! आप मुझसे कौतुकमय वाणी सुनिये । मैं समुद्र के मध्य स्थित सिंहल द्वीप में गया था ।२६। उस द्वीप में घटित वृत्तान्त सुनने में बड़ा अच्छा है । राजा बृहद्रथ की कन्या का चरित्र अमृत के समान श्रेष्ठ है ।३०। कौमुद्यामिह जाताया जगतां पापनाशनम् । चरितं सिंहले द्वीपे चातुर्वर्ण्यजनावृते ।३१।