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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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( २३६ ) प्राह भागवतान्धर्मानष्टादशसहस्रकान् ॥ १० ॥ तदा नृपे लय प्राप्ते सप्ताहे प्रश्नशेषितम् । मार्कण्डेयादिभिः पृष्टः प्राह पुण्याश्रमे शुकः ॥ ११ ॥ तत्राह तदनुज्ञातः श्रुतवानस्मि या कथा । भविष्या कथयामीह पुण्या भागवती शुभा ॥ १२ ॥ सूतजी बोले--हे मुनीश्वरो ! प्राचीन समय की बात है—इस परम अद्भुत उपाख्यान कोपूछने पर ब्रह्माजी ने नारदजी से जो कहा था, वही मे आपके प्रति कहता हूँ ॥८॥ फिर नारद जी ने इसका वर्णन व्यासजी से किया, जिसे व्यासजी ने अपने मेधावी पुत्र ब्रह्मरात को सुनाया ॥६॥ ब्रह्मरात ने उसे अभिमन्यु-पुत्र विष्णुरात के प्रति अठारह सहस्र श्लोको मे सभा मडप के मध्य मे सुनाया ॥१०॥ उस समय प्रश्न होते-होते राजा विष्णुरात ने एक सप्ताह मे शेष प्रश्नो को पूर्ण कर लिया और लय को प्राप्त हो गये । उसी कथा के शेष अंश अर्थात् संक्षिप्त रूप को शुकदेवजी ने मार्कण्डेय प्रभृति मुनियो के प्रश्न करने पर कहा ॥११॥ भगवान् श्री शुकदेवजी द्वारा वर्णित उसी सक्षिप्त पुण्यमय, भागवत उपाख्यान को, जो भविष्य मे घटित होने वाला है, आपसे कहता हूँ ॥१२॥ ताः शृणुध्वम्महाभागा समाहित धियोऽनिशम् । गते कृष्णे स्वनिलय प्रादुर्भूतो यथा कलिः ॥ १३ ॥ प्रलयान्ते जगत्स्रष्टा ब्रह्मा लोकपितामह । ससर्ज घोर मलिन पृष्ठदेशात स्वपातकम् ॥१४॥ स चाधर्म इति ख्यातस्तस्य वंशानुकीर्त्तनात । श्रवणात्स्मरणाल्लोक सर्वपापै प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ अधर्मस्य प्रियारम्या मिथ्या मार्जारलोचना । तस्य पुत्रोऽसितेजस्वी दम्भः परमकोपनः ॥ १६ ॥