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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक १५१ राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११६॥ उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये और उसे कारागार में डाल दिया ॥११७॥ कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिनन्दन के अवतार उस सर्प का स्मरण किया। स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११८॥ उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा-'मैं जाता हूँ और पैर से सिर तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९॥ जबतक तुम आकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२०॥ तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२१॥ ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन फैला दिये ॥१२२॥ तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि- सत्त्व ने कहा- मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२३॥ उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा-॥१२४॥ 'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा लो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और तेरी इस बात के साक्षी हैं ॥१२५॥ यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा-'राजा को शीघ्र छोड़ दो' ॥१२६॥ तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२७॥ सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने आश्रम को चला गया ॥१२८॥ इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार वाले महान् व्यक्तियों को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२९॥ अविश्वास की खान स्त्रियों के हृदय में प्राण देने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१३०॥