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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ९९ 'अच्छा जो हो मैं अन्दर जाता हूँ। देखा जायगा'। इस प्रकार सोचता और बन्दियों ने सूचित किया जाता हुआ राजा अन्दर गया ॥१४७॥ उसके अन्दर आते ही मुस्कराते हुए राजा विक्रमादित्य ने उठकर उसे गले से लगा लिया ॥१४८॥ तदनन्तर मदनमाला के समीप ही बैठे हुए दोनों ने आपस में कुशल-मंगल पूछा ॥१४९॥ वार्तालाप के सिलसिले में राजा नरसिंह ने विक्रमादित्य से पूछा कि 'ये सोने के मनुष्य कैसे आये ? ॥१५०॥ तब उसी प्रसंग में राजा विक्रम ने प्रचंडबुद्धि भिक्षु का मारना धनपति कुबेर से आकाश- गति और आश्चर्यसुवर्ण के पाँच महापुरुषों की प्राप्ति की वह आश्चर्यभरी समस्त कथा कह सुनाई ॥१५१ १५२॥ विक्रम का वृत्तान्त सुनकर उसे आकाशचारी एवं महाशक्तिशाली जानकर नरसिंह ने मित्रता के लिए प्रस्ताव किया और मित्रता प्राप्त की ॥१५३॥ इस प्रकार, मित्रता प्राप्त करने पर राजा नरसिंह ने विक्रम को अपनी राजसभा में ले जाकर राजोचित स्वागत-सत्कार से सम्मानित किया और उसके द्वारा सम्मानित राजा विक्रम फिर से मदनमाला के घर पर आ गया ॥१५४ १५५॥ इस प्रकार, अपने बल और प्रतिभा प्रकर्ष से अपनी असाधारण प्रतिज्ञा को पूरी करके राजा विक्रमादित्य ने अपने नगर पाटलिपुत्र में जाने का विचार किया ॥१५६॥ राजा के वियोग को सहन न करती हुई मदनमाला भी अपने देश का त्याग कर और अपनी सम्पत्ति ब्राह्मणों को दान करके राजा के साथ पाटलिपुत्र जाने को उद्यत हुई ॥१५७॥ तब राजाओं में चन्द्रमा के समान वह राजा विक्रमादित्य अनन्य चित्तवाली प्राणप्रिया मदनमाला को उसके हाथी घोड़े और मंत्रियों के साथ अपने पाटलिपुत्र नगर में ले आया ॥१५८॥ राजा नरसिंह के दृढ़ स्नेहयुक्त सौहार्द से सन्तुष्ट राजा विक्रम प्रेम के कारण स्वदेश को छोड़कर आई हुई मदनमाला के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥१५९॥ हे महाराज (नरवाहनदत्त) इस प्रकार वेश्याएँ भी उदारचरित और वैसी ही सदाचारिणी होती हैं—जैसी महानिशिखा। अन्य कुलीन स्त्रियों की तो बात ही क्या ॥१६०॥ इसप्रकार मरुभूति के मुख से उदार कथा को सुनकर राजा नरवाहनदत्त की उनकी उत्तम विद्याधर-कुल के अनुरूप तत्त्वभू रत्नप्रभा ने अत्यधिक आनन्द प्राप्त किया ॥१६१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का चौथा तरंग समाप्त