कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक १५१ 'यह क्या है ?—इस प्रकार आकर खिड़की से सेविकाओं से पूछने पर वे बोलीं— 'महाराज ! यह धर्मगिरि नामक कंचुकी चिल्ला रहा है। उसे किसी मूर्ख मित्र ने यहाँ आकर कह दिया कि तुम्हारा भाई तीर्थयात्रा के लिए गया था। वह किसी देश में मर गया ॥३-४॥ यह सुनते ही 'मैं राजभवन में हूँ'—इस बात का ध्यान न रखकर शोक से विह्वल वह चिल्लाने लगा। अब उसे कुछ लोग उसके घर पर ले गये ॥५॥ यह सुनकर युवराज उसके दुःख से दुःखी हुए और रानी रत्नप्रभा भी खिन्न-सी होकर बोली—'प्रिय भाई के मरने का दुःख सचमुच असह्य होता है। सच है विधाता ने उस व्यक्ति को अजर और अमर क्यों नहीं बना दिया? ॥६-७॥ रानी के इस प्रकार वचन सुनकर मरुभूति बोला—'महारानी ! मनुष्यों में अजर और अमर होना कैसे सम्भव है। इस प्रसङ्ग में यह कथा सुनो—॥८॥ नागार्जुन की कथा चिरायु नाम के नगर में चिरायु नाम का राजा था। वह चिरायु समस्त सम्पत्तियों का घर था ॥९॥ उस राजा का मन्त्री नागार्जुन बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न परम दयालु दानी और विज्ञानवेत्ता था ॥१०॥ अनेक ओषधियों की शक्तियों को जाननेवाला रसायनों के निर्माण में सिद्धहस्त उस मन्त्री ने अपने विज्ञान-बल से अपने को तथा राजा को वृद्धावस्था-रहित और चिरजीवी बना दिया था ॥११॥ किसी समय मन्त्री नागार्जुन के पुत्रों में सबसे प्यारा पुत्र बालवय होकर मर गया ॥१२॥ नागार्जुन को उसका ऐसा सन्ताप हुआ कि उसने मनुष्य की मृत्यु को सदा के लिए समाप्त करने के लिए (उन्हें अमर बनाने के लिए) अपने तप और ज्ञान के प्रभाव से अमृतमय ओषधियों से अमृत बनाने का प्रयत्न प्रारम्भ किया ॥१३॥ अन्य सभी ओषधियों का उसने संग्रह कर लिया। केवल एक ओषधि मिलाना बाकी बच रहा था। नागार्जुन जब उस ओषधि की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि तबतक इन्द्र को इस बात का पता लग गया ॥१४॥ इन्द्र ने देवताओं से सम्मति करके देव-वैद्य अश्विनीकुमार को इस प्रकार आदेश दिया कि तुम पृथ्वी पर जाकर मेरी ओर से नागार्जुन से कहो—॥१५॥ कि 'तुमने मन्त्री होकर भी यह कौन-सी अनीति आरम्भी है कि अब तुम प्रजापति (ब्रह्मा) को भी जीतना चाहते हो ? ॥१६॥