कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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हे राजन् ! मैं पूर्वजन्म का स्मरण करने वाला हूँ। मैंने निन्यानब्बे बार प्रत्येक जन्म में अपना सिर दान किया है। यह सौवां मेरा जन्म भी सिर देने के लिए ही हुआ है। इसलिए, तुम कुछ न बोलो। मेरे याचक को विमुख न होना चाहिए ॥४७-४८॥ तो अब मैं तुम्हारे पुत्र को अपना सिर देता हूँ। केवल तुम्हारा मुंह देखने के लिए ही मैंने इतना विलम्ब किया है ॥४९॥ ऐसा कहकर राजा से आलिङ्गन कर और औषधालय से एक चूर्ण मँगाकर राजकुमार की तलवार पर उसने लेप कर दिया ॥५०॥ तब उस तलवार के प्रहार से मन्त्री की गर्दन इस प्रकार कट गई जैसे नाल से कमल कटकर अलग हो जाता है ॥५१॥ तदनन्तर रोने और चिल्लाने का बड़ा कोलाहल उठने पर और राजा के प्राण-त्याग के लिए उद्यत होने पर आकाश से अशरीरी वाणी हुई—॥५२॥ 'राजन् ! आत्महत्या का यह अकार्य न करो। यह तुम्हारा मित्र नागार्जुन शोचनीय नहीं है। उसका जन्म अब न होगा। वह बुद्ध के समान गति को प्राप्त हो गया' ॥५३॥ यह सुनकर राजा चिरायु मार्ग से विमुख हुआ और शोक में सब कुछ दान देकर और राज्य का त्याग करके वन में चला गया ॥५४॥ वन में रहता हुआ वह कुछ समय बाद तप से परमगति को प्राप्त हुआ और उसका पुत्र जीवहर राज्य पर बैठा ॥५५॥ उसके राज्य प्राप्त करने पर पिता के वध से असन्तुष्ट नागार्जुन के पुत्रों ने राष्ट्र-विप्लव कराकर शीघ्र ही उसका नाश करा दिया ॥५६॥ उसके शोक से उसकी माता धनपरा का हृदय फट गया और वह भी मर गई। सच है अनार्य (अनुचित) पथ से चलनेवालों का कल्याण कैसे हो सकता है ? ॥५७॥ तब राजा के मुख्यमन्त्रियों ने दूसरी रानी के गर्भ से उत्पन्न शतायु नामक पुत्र को राजगद्दी पर बैठाकर राज-कार्य का संचालन किया ॥५८॥ इस प्रकार नागार्जुन के द्वारा मनुष्यों की मृत्यु को दूर करनेवाले प्रयत्न को देवताओं ने सहन नहीं किया और वह नागार्जुन भी मर गया ॥५९॥ इस प्रकार, अनिवार्य दुःखों से भरा हुआ यह संसार अनित्य है। इसमें जो कुछ विधाता को इच्छित नहीं है, उसे सैकड़ों यत्नों से भी नहीं किया जा सकता ॥६०॥