कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक १५९ इस प्रकार, कथा कहकर मरुभूति के मौन हो जाने पर नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उठकर दैनिक कार्यों में लग गया ॥६१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का सप्तम तरंग समाप्त
अष्टम तरंग कर्पूरिका की कथा किसी एक दिन नरवाहनदत्त अपनी उत्कण्ठिता प्यारी रत्नप्रभा को 'शीघ्र ही आऊँगा'— ऐसा आश्वासन देकर, पिता बलराज तथा अन्य मित्रों के साथ हाथी-घोड़ों की सेना लेकर शिकार खेलने के लिए जंगलों में गया ॥१—२॥ वह मृगया-क्रीड़ा-रूप लता नरवाहनदत्त के लिए प्रसन्नता का कारण बन गई। वह मृगया-भूमि बड़े-बड़े हाथियों के कुम्भस्थलों को फाड़नेवाले मारे हुए सिंहों के नखों से गिरे हुए मोतियों से ऐसी मालूम हो रही थी मानो उसमें बीज बोय गये हैं। भालों से मारे गये बाघों के बिखरे हुए दाढ़ों से अंकुरित हुई के समान मालूम होती थी। मारे हुए हरिणों के शरीर से निकलकर फैले हुए रक्त से मानो लाल पल्लवों से युक्त मालूम हो रही थी। बाणों से बींध गये सूअर के मुखों व भालों मुच्छों से भरीहुई और शरभों १ के गिरे हुए शरीरों से मानों फलवाली मालूम हो रही थी। उस भूमिमें भयंकर सनसनाहट के साथ बाण छूट रहे थे। तभी वह जंगली मृगया-भूमि (शिकारगाह) विचित्र शोभा धारण कर रही थी ॥३—६॥ कुछ देर बाद थककर विश्राम करके नरवाहनदत्त घोड़े पर सवार एकमात्र गोमुख के साथ दूसरे जंगल में प्रवेश कर गया ॥७॥ वहाँ जाकर उसने गोफन से गोली फेंकने का खेल प्रारम्भ किया। इतने में ही उस मार्ग में कोई तपस्विनी आ गयी। नरवाहनदत्त के हाथ से छूटी हुई एक गोली उस तपस्विनी के सिर में जा लगी। तब वह तपस्विनी कुछ रोष करके बोली—॥८-९॥ 'अभी मुझमें ऐसी मस्ती है तो जब कर्पूरिका को पत्नी बना लोग तब न जाने कितना अधिक मद बढ़ जाएगा' ॥१०॥ यह सुनकर और घोड़े से उतरकर नरवाहनदत्त तपस्विनी के पैरों पर गिरकर बोला—॥११॥ १ यह पशु (मृग विशेष) आठ पैर वाला होता है। आजकल यह नहीं मिलता।—अनु