BharatKosha
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 194 of 1079

Read in context
Page 194

सप्तम लम्बक १६७ वह राजा उन दोनों रानियों के साथ पुत्र प्राप्ति की कामना से पार्वती अम्बिका की आराधना करता हुआ निराहार रहकर और कुशा पर सोकर तपस्या करने लगा ॥५६॥ उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तवत्सला भवानी ने उसे स्वप्न में स्वयं दर्शन देकर और दो फल देकर आज्ञा दी—'उठो ! अपनी स्त्रियों को ये दो फल खाने के लिए दो। इसके प्रभाव से हे राजन् ! उन दोनों के दो पुत्र उत्पन्न होंगे ॥५७-५८॥ ऐसा कहकर गौरी अन्तर्हित हो गई। राजा उठा और प्रातःकाल दोनों हाथों में दो फल देखकर प्रसन्न हुआ। राजा ने स्वप्न के समाचार से उन दोनों रानियों को आनन्दित किया और स्नान पूजन आदि करके व्रत का पारण किया ॥५९-६०॥ रात को राजा ने अधिकतुंगमा रानी के महल में जाकर उसे फल दिया और उसने उसे खा लिया ॥६१॥ राजा के मुख्य मन्त्री की कन्या होने के गौरव के कारण राजा उस रात को उसी रानी के पास रह गया और दूसरी रानी के लिए रखे हुए फल को सिरहाने रख दिया। राजा के सोये रहने पर रानी अधिकतुंगमा ने उठकर एक साथ दो समान पुत्रों की इच्छा से उस दूसरे फल को भी ऊपर के भाग के पास से खा लिया। स्त्रियों का सौत के प्रति द्वेष स्वाभाविक ही होता है ॥६२ ६५॥ सबेरे उठकर उस फल को खोजते हुए राजा से उसने कहा कि 'वह दूसरा फल भी मैंने ही खा लिया' ॥६६॥ तब दुःखित मनवाला राजा उसके भवन से निकलकर और राजकार्यों में दिन बिताकर रात को दूसरी रानी के भवन में गया ॥६७॥ वहाँ उस रानी के फल माँगने पर राजा ने कहा कि 'मेरे सोये रहने पर तुम्हारी सौत ने छल से उस फल को भी खा लिया' ॥६८॥ तब वह रानी काष्ठालंकारा पुत्र की उत्पत्ति के कारणभूत उस फलको न पाकर अत्यन्त दुःखी होकर चुप रही ॥६९॥ कुछ समय व्यतीत होने पर वह रानी अधिकतुंगमा गर्भवती हुई और दसवें महीने उसने एक साथ दो बालक उत्पन्न किये ॥७०॥