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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक १९५ क्योंकि रस्सी ढीली हो गई है और यन्त्र की कील भी खिसक गई इसलिए अब हम दोनों को अभी ही यहाँ से हट जाना चाहिए ॥३६॥ क्योंकि प्रातःकाल राजा हम दोनों को चोर समझकर मरवा डालेगा इसलिए कि हम दोनों ही यहाँ ऐसे कूटयन्त्रों को बनानेवाले और जाननेवाले प्रसिद्ध कारीगर हैं॥३७॥ मेरे पास जो मायामय यन्त्रवाला विमान (आकाश-यान) है, वह एक बार चाभी देने से बत्तीस कोस तक जाता है॥३८॥ उसके द्वारा हम लोग सुखदायी विदेश में भी जा सकते हैं। बुरे काम में हितैषी के हित वाक्य न मानने से सुख कहाँ मिल सकता है? उस मेरा हित चाहनेवाले तुम्हारे बहुत मना करने पर भी पापबुद्धि मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी उसी पाप का यह फल निष्पाप तुम्हें भी भोगना पड़ा ॥३९-४०॥ ऐसा कहकर मेरा बड़ा भाई प्राणधर अपने कुटुम्ब के साथ दूर जानेवाले विमान पर चढ़ गया ॥४१॥ उसके कहने पर भी बहुत लोगों से भरे हुए उस विमान पर मैं नहीं बैठा। इस आशंका से कि वह विमान आकाश में उड़कर कहीं दूर न चला जाय ॥४२॥ यथार्थ नामवाले उस प्राणधर के चले जाने पर एकाकी मैं भी प्रातःकाल ही में अपने बनाये हुए वायुयन्त्रवाले विमान से शीघ्र ही आठ सौ कोस दूर राजा से भय भागा ॥४३-४४॥ उस आकाश-यान में पुनः पानी भरकर मैं और भी दो कोस दूर चला आया ॥४५॥ तब समुद्र की समीपता की शंका से विमान को छोड़कर पैरों से चलता-चलता इस सूने नगर में आ गया ॥४६॥ देखते-देखते मैं बहुमूल्य आभूषण शय्या आदि साज-सामान से भरे हुए उस राजमन्दिर में आया। नागरत्न नाम की ओषधीय लगाकर और पहरे को लांघकर राजा के पलंग पर सोता हुआ अकेला मैं सोचने लगा—॥४७-४८॥ कि मैं इस निर्जन नगर में क्या करूँगा। प्रातःकाल उठकर कहीं इधर उधर देखूँगा। अब राजा के बाहुबल से तो मुझे भय नहीं रहा ॥४९॥ ऐसा सोचकर काटे हुए भुजाये प्रातःकाल के समय खाट पर चढ़े हुए किसी पुरुष से इस प्रकार कहा—॥५०॥