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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक २०३ 'जब अर्थलाभ ने मुझे दूसरे के हाथ बेच दिया मूल्य देकर मुझे खरीद लिया गया तब मैं अब उस अर्थलोभ की भार्या कैसे हूँ? जैसा वह निर्लज्ज है क्या मैं भी वैसी ही निर्लज्ज हूँ? ॥५५॥ आपलोग ही मुझे कहिए कि क्या यह कोई अच्छी बात है? तो अब आप लोग जाइए। जिसने मुझे खरीदा है वही मेरा पति है' ॥५६॥ मानपरा से इस प्रकार कहे गये दूतों ने लौटकर अर्थलोभ से नीचा मुँह किये हुए सभी सन्देश उसी प्रकार सुना दिया ॥५७॥ यह सुनकर उस नराधम अर्थलाभ ने बलपूर्वक अपनी पत्नी को गुप्तधन के घर से लाने की इच्छा प्रकट की तब हरदत्त नामक उसके मित्र ने कहा—॥५८॥ 'गुप्तधन से छीनकर तुम अपनी स्त्री को नहीं ला सकते। उस वीर के आगे तुम्हारी वीरता मैं नहीं देखता ॥५९॥ उसे न्याय की अनुरागिणी तुम्हारी भार्या ने शूरवीर बना दिया है, वह बलवान् है और अनेक बलवान् मित्रों के साथ है। और तू तो कंजूसी के कारण बेच दी गई पत्नी से विरहित और अपमान से निरुत्साह होकर नपुंसक बन चुका है। न स्वयं उसके समान बलवान् है। और न तेरे मित्र ही बलवान् हैं। इसलिए उस पात्र को जीतने में तू कैसे समर्थ हो सकता है? ॥१०१-२॥ स्त्री-विक्रय-रूप तुम्हारे कुकृत्य को सुनकर राजा भी क्रोध करेगा। इसलिए चुप रहो। व्यर्थ हँसी का पात्र बनने का यत्न न करो ॥१०३॥ इस प्रकार, मित्र से रोका गया भी अर्थलाभ क्रोध से भरकर अपने सिपाहियों को लेकर गुप्तधन पर चढ़ाई कर दी और उसे घेर लिया ॥१०४॥ तब मित्रों के साथ गुप्तधन की सेना के सामने अर्थलोभ की सेना क्षण-भर में भाग खड़ी हुई ॥१०५॥ तब वह अर्थलाभ भागकर तुरन्त राजा के समीप जा पहुँचा और बोला—'महाराज! गुप्तधन नामक बनिया ने मेरी स्त्री का अपहरण कर लिया' ॥१०६॥ इस प्रकार, अपने कुकृत्यों को छिपाकर उसने राजा से निवेदन किया तो राजा ने क्रोध से गुप्तधन को पकड़वाने की इच्छा की ॥१०७॥ तब राजा का मघान नामक मन्त्री बोला—'स्वामी! उस बनिया को वैसे ही पकड़ा नहीं जा सकता। ग्यारह मित्रों के साथ आये हुए उसके पास एक लाख से अधिक अच्छे-अच्छे घोड़े हैं। और इस विषय का वास्तविक तत्त्व भी आपने नहीं जाना ॥१०८-१०९॥