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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक २६१ भूमि पर पड़े हुए राजा चण्डसेन के बाणों के साथ गिरने हुए (मृत) विद्याधर, मानो शिर और शरीर में शरण की प्रार्थना कर रहे थे ॥१४८॥ जनता की दृष्टियों में देखा जाता हुआ सूर्यप्रभ आकाश में युद्ध करता हुआ अत्यन्त शोभित हो रहा था। रक्त से रंजित आकाश मानो छिड़के हुए सिन्दूर की शोभा धारण कर रहा था॥१४९॥ सूर्यप्रभ द्वारा ललकार किये हुए दामोदर के सामने आकर युद्ध करने लगा और युद्ध करते हुए उसने खड्ग प्रयोग (पैंतरेबाजी) से अन्तर घुसकर दामोदर की ढाल-तलवार को काटकर उस पर प्रहार कर दिया ॥१५०-१५१॥ तदनन्तर सूर्यप्रभ जैसे ही उसका सिर काटने के लिए तैयार हुआ वैसे ही विष्णु भगवान् ने आकाश में आकर उसे मना करते हुए हुंकार दिया॥१५२॥ हुंकार को सुनकर और विष्णु भगवान् को देखकर उदार गौरव से मग्न सूर्यप्रभ ने दामोदर को मारने से अपना हाथ रोक लिया॥१५३॥ फिर भगवान् प्रसन्न व प्रसन्न हुए उस अपने भक्त दामोदर को लेकर अन्तर्हित हो गए क्योंकि भगवान् अपने भक्तों की इस लोक और परलोक में भी रक्षा करते हैं॥१५४॥ दामोदर के लुप्त होते ही उसके साथी सभी विद्याधर इधर-उधर भाग गये और सूर्यप्रभ भी आकाश से उतरकर अपने पिता के पास आ गया॥१५५॥ उसके पिता चन्द्रप्रभ ने अपने सभी अनुचरों के साथ जय-जयकार करते हुए सूर्यप्रभ का यथायोग्य अभिनन्दन किया। और अन्य राजाओं ने भी उसकी वीरता की प्रशंसा की॥१५६॥ इसप्रकार सभी लोग प्रसन्न होकर सूर्यप्रभ की प्रशंसा और उसकी वीरता की चर्चा कर रहे थे कि दूर से ही राजा सुषेण का दूतगण दूत वहाँ आ पहुँचा। उसने आते ही राजा चन्द्रप्रभ को प्रणाम किया। जिन्होंने उस पत्र को खोलकर सभा में इस प्रकार पढ़ा—॥१५७-१५८॥ हे मित्र राजा चन्द्रप्रभ आपके यहाँ के आने के समय राजा चन्द्रप्रभ से इसके पहले जो शिष्टाचार के सम्बन्धी बातों का निर्णय हुआ था वह सब कुछ आपको स्मरण ही होगा। हम सब लोग यहाँ ठीक हैं। यह जानकर इस प्रकार उत्तर दें॥१५९॥ 'प्रहस्त का युद्ध समाप्त होने के पश्चात् राजा चन्द्रप्रभ के साथ उपस्थित होकर हम सबने जो बात तय की थी उसपर विचारकर, जिस तरह युद्ध समाप्त हो उसी का उपाय करने के लिए यह पत्र भेजा गया है।' इस पत्र का उत्तर दें ॥१६०॥