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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक २९७ अत्यधिक धन से परिपूर्ण और बहुत-सी प्रजाओं से भरा हुआ तथा महाभोगी¹ सूर्यप्रभ से अलंकृत शाकल नगर ऐसा लगता था मानों स्वर्ग अलकापुरी और पाताल तीनों लोकों के सम्मिश्रण से इस पुरी की रचना की गई हो॥१८६॥ तदनन्तर वह युवराज सूर्यप्रभ पटरानी मदनसेना तथा अन्यान्य रानियों के साथ समस्त सम्पत्तियों से भरपूर होकर समस्त उत्तमोत्तम भोगों को भोगता हुआ पिता तथा मन्त्रियों के साथ आने का वचन दिये हुए मयासुर दानव के आने की दिन-रात प्रतीक्षा करता हुआ राजधानी में सुखपूर्वक रहने लगा॥१८७॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागरके सूर्यप्रभ लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग चन्द्रप्रभ की सभा में मय दानव का आगमन एक बार दरबार में सूर्यप्रभ तथा चन्द्रप्रभ के मन्त्रियों के सहित बैठे-बैठे सिद्धार्थ के साथ बातचीत के प्रसंग मे मय का नाम आते ही दरबार-भवन की भूमि बीच में सहसा फट पड़ी ॥ १-२॥ फटी हुई भूमि के दरार से पहले शब्द उत्पन्न हुआ तदनन्तर सुगन्धित वायु निकली और उसके पश्चात् उसमे से मयासुर का आविर्भाव हुआ ॥३॥ वह दानव (मयासुर) पर्वताकार था। उसके काले और ऊँचे सिर-रूपी शिखर पर (पीले वर्ण की) केश-रूपी महौषधियां मानों जल रही थी और रक्त वस्त्र-रूपी धातु शरीर पर दीख रहे थे ॥४॥ राजा चन्द्रप्रभ द्वारा समुचित सत्कार प्राप्त करने के बाद सिंहासन पर स्थित दानवराज मय इस प्रकार बोला—॥५॥ १ महाभोगी—पाताल-पक्ष में महासर्प। सूर्यप्रभ के पक्ष में—महान् भोगी विलासी या ऐश्वर्य-सम्पन्न।—अनु ३३