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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक २१७ उसका नाम सूर्यप्रभ है और अपने सौन्दर्य से वह कामदेव-विजयी है। कलावती ने गुप्त रूप से जाकर उसे आत्मसमर्पण कर दिया है। आज रात में इसके पास जाने पर राजा प्रह्लाद की कन्या महस्तिका भी स्वयं वहाँ आ गई ॥२८३-२८४॥ तब उसके साथ सपत्नी-भाव से कलह करके आई हुई कलावती आत्मघात के लिए तैयार हुई, यह देखते ही उसकी बहन सुकलावती ने उसे बचाया ॥२८५॥ तब कमरे में जाकर, खाट पर पड़कर और समाचार सुनकर त्रस्त हुई बहन के साथ अब वह पड़ी है ॥२८६॥ सखिकाओं की ये बात सुनकर और उसी अदृश्य रूप से भीतर आकर समान रूपवाली उन दोनों बहनों को मैंने देखा ॥२८७॥ जबतक प्रभास सूर्यप्रभ को एकान्त में यह समाचार कह ही रहा था कि इतने में ही प्रहस्त भी वहाँ आ गया ॥२८८॥ सूर्यप्रभ के पूछने पर प्रहस्त ने कहा— जब मैं यहाँ से महस्तिका के निवास-गृह में पहुँचा तब वह भी दो सखियों के साथ निमन्त्रित होकर वहीं पहुँची। मैं अपनी विद्या के प्रभाव से अदृश्य होकर उसके भवन में गया। वहाँ मैंने उसी के समान रूपवाली उसकी बारह सखियों को देखा ॥२८९-२९०॥ वे सभी सखियाँ रत्नों के सुन्दर पलंग पर बैठी हुई उसे घेरकर बैठ गईं। उनमें एक उससे कहने लगी—॥२९१॥ 'सखि ! तू सहसा दुःखी क्यों हो रही है विवाह के प्रस्तुत होने पर भी तुझे यह खिन्नता क्यों हो रही है' ॥२९२॥ यह सुनकर कुछ सोचती हुई प्रह्लाद-पुत्री बोली—'मेरा विवाह कहाँ हो रहा है। मुझे किसे दिया गया और तुझसे किसने कहा' ॥२९३॥ उसके ऐसा प्रश्न करने पर सभी सखियाँ बोलीं—'प्रातःकाल तुम्हारा विवाह है और तुम्हें सूर्यप्रभ को दिया गया है। तुम्हारे पीछे यह तुम्हारी माता महारानी ने यह कहा है और विवाह मण्डप के कार्यों में हम लोगों की नियुक्ति कर दी गई है ॥२९४-२९५॥ इसलिए तू धन्य है जिसका पति सूर्यप्रभ है। जिसके रूप के ध्यान में सुरङ्गनाओं को रात में नींद नहीं आती ॥२९६॥ हम लोगों को तो यह दुःख हो रहा है कि जब तू वहाँ होगी और हम यहाँ ? उस सुन्दर पति को पाकर तू हमें भूल जायगी' ॥२९७॥ २८