कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextअष्टम लम्बकं ३१७ यह मेरा दृढ़ निश्चय है। दूसरों की स्त्रियों का अपहरण करने में वीरता दिखानेवाला वह महान् दुष्ट है॥८८॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके उन पर विजय प्राप्त करने को जाने के निमित्त उसने ज्योतिषियों से आठवें दिन लग्न (मुहूर्त्त) निश्चित किया ॥८९॥ सब विग्रह के लिए उद्योग करते हुए सूर्यप्रभ का दृढ़ निश्चय देखकर उस भावी वाणी से और भी दृढ़ करके मय ने सूर्यप्रभ से कहा—॥९०॥ यदि तुम सचमुच युद्ध के लिए प्रयत्नशील हो तो मैं कहता हूँ कि मैंने ही अपनी माया दिखाकर तुम्हारी स्त्रियों को पाताल में रख लिया है ॥९१॥ ऐसा करने से ही तुम जोश के साथ विग्रह का उद्योग करोगे इसीलिए मैंने ऐसा किया था। आग वैसे उतना ही प्रचंड रूप धारण नहीं करती जैसी वायु से प्रेरित होकर पसरती है ॥९२॥ मय की ऐसी बातें सुनकर सभी लोग आनन्द से प्रसन्न हुए। तब मय ने कहा—तुम पाताल में आओ। मैं तुम्हारी पत्नियों को दिखाता हूँ। तदनन्तर मयासुर के साथ वे उसी पुराने मार्ग से चौथे पाताल में गए ॥९३-९४॥ वहाँ आकर एक मकान से मय ने उसकी मदनसेना आदि सभी स्त्रियों को लाकर उसे सौंप दिया ॥९५॥ उन सब पत्नियों तथा असुर-कन्याओं को साथ लेकर मय से प्रेरित सूर्यप्रभ आदि प्रह्लाद का दर्शन करने गये ॥९६॥ मय से कश्यप द्वारा वर प्राप्ति का समाचार सुनकर असुरनाथ प्रह्लाद ने शस्त्र उठाकर सूर्यप्रभ की परीक्षा के लिए बनावटी क्रोध करते हुए कहा—॥९७॥ 'अरे पापी मैने सुना है कि तूने मेरे भाई द्वारा मारण करके लाई गई उन बारह कन्याओं का अपहरण कर लिया है इसलिए मैं तेरा वध करता हूँ' ॥९८॥ यह सुनकर बिना किसी प्रकार का विकार किये सूर्यप्रभ ने कहा—मेरा शरीर आपके अधीन है। अतः आप मुझ उद्दण्ड पर शासन कीजिए ॥९९॥ ऐसा कहते हुए सूर्यप्रभ से प्रह्लाद ने हँसकर कहा—मैंने तेरी परीक्षा ली है, तुझमें घमण्ड का लेश भी नहीं है। वर माँग, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ। तब सर्वज्ञता व गुरुजनों और शिव में भक्ति बनी रहे यह वर माँगा ॥१००-१०१॥ तब सबके सन्तुष्ट हो जाने पर प्रसन्न प्रह्लाद ने कान्तिमती नाम की दूसरी कन्या भी सूर्यप्रभ को दे दी ॥१०२॥