कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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तब किसी जाज्वल्यमान पुरुष ने आकर हमलोगों को जल से निकालकर आग में फेंक दिया। किन्तु, वहाँ पर भी हम आग में जले नहीं ॥१४०॥
इसके बाद घटा घिर आई और उसने रक्त की वर्षा की जिससे सारी दिशाएँ रक्तमय हो गईं। और, रात के साथ ही मेरी नींद भी खुल गई, प्रातःकाल हो गया' ॥१४१॥
ऐसा कहते हुए सूर्यप्रभ से सुवासकुमार ने कहा—'इस स्वप्न से कठिन परिश्रम द्वारा अभ्युदय की सूचना मिलती है ॥१४२॥
जो पानी का प्रवाह था वह संग्राम का सूचक था। नहीं डूबना धैर्य का सूचक था। जो नाचते हुए और बहते हुए तुम लोगों को वायु ने विपरीत दिशा में बदल दिया वह तुम्हें कोई शरण देनेवाला रक्षक है। जो ऊर्ध्वरेता तेज से जलते हुए पुरुष थे वह साक्षात् शंकर भगवान् हैं। उसने तुम्हें अग्नि में फेंका वह तुम्हें महासंग्राम में झोंका। मेघों का उमड़ना किसी भय का सूचक था और रक्त-वृष्टि का होना भय के विनाश का सूचक था। इसी प्रकार, दिशाओं का लाल हो जाना तुम्हारी समृद्धि या अभ्युदय का सूचक हुआ ॥१४३-१४६॥
स्वप्न कई प्रकार के होते हैं—जैसे अपार्थ यथार्थ और अपार्थ। जिसका फल तुरन्त होता है, वह अयथार्थ है। प्रसन्न हुए देवता आदि का आदेश यथार्थ होता है। गम्भीर अनुभव और चिन्ता आदि से होनेवाला स्वप्न अपार्थ है ॥१४७-१४८॥
रजोगुणप्रधान और बाह्य विषयों से विमूढ़ प्राणी निद्रा के वश में होकर उन-उन कारणों से स्वप्न देखता है ॥१४९॥
स्वप्नों का विलम्ब से अथवा तुरन्त फल मिल जाना समय-भेद से होता है। रात्रि के अन्त में देखा हुआ यह स्वप्न शीघ्र फल देनेवाला है' ॥१५०॥
मुनि-कुमार से यह सुनकर सूर्यप्रभ आदि प्रसन्न हुए और उठकर अपने-अपने दैनिक कार्यों में लग गये ॥१५१॥
इतने में ही श्रुतशर्मा के पास से प्रहस्त लौट आया और मय आदि के पूछने पर वहाँ जो कुछ हुआ कहन लगा—॥१५२॥
यहाँ से मैं वेग के साथ त्रिकूट पर्वत स्थित सोने की बनी विद्युत्प्रभाका नाम की नगरी को गया ॥१५३॥