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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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[Page Header] अष्टम लम्बक १४१

इस बात पर विश्वास करके उन सब के जाने पर उनके वीर मन्त्रियों के साथ सूर्यप्रभ रात्रि में ही चन्द्रपाद गिरि पर गया ॥१९८॥ जाते हुए उनके मार्ग में शस्त्र उठाये हुए यक्ष गुह्यक कूष्मांड आदि विघ्न करने के लिए खड़े हो गये ॥१९९॥ उनमें से कुछ को शस्त्रों से विवश करके और कुछ को विद्या-प्रभाव से मोहित करके सूर्यप्रभ आदि चन्द्रपाद गिरि पर पहुँच गये ॥२००॥ वहाँ गुफा के द्वार पर पहुँचने पर विचित्र आकृतिवाले शिवजी के गणों ने उन्हें गुफा में आने से रोका ॥२०१॥ 'इसके साथ युद्ध न करना चाहिए क्योंकि इससे भगवान् शिव क्रुद्ध हो जायेंगे। इसलिए शिव के अष्टोत्तर शत नाम के पाठ से उन्हीं वरदायक की स्तुति करते हैं। ये उनके गण इसी से प्रसन्न होते हैं' सुबाहुकुमार ने इस प्रकार सूर्यप्रभ आदि से कहा ॥२०२-२०३॥ तब वे इसी प्रकार शिव की स्तुति करने लगे। स्वामी की स्तुति से प्रसन्न होकर वे गण उनसे बोले—'हमने इस गुफा को छोड़ दिया है। आपलोग महौषधियों को लें किन्तु सूर्यप्रभ स्वयं उसमें प्रवेश न करें ॥२०४-२०५॥ केवल प्रभास ही उसमें जाय यह गुफा उसके लिए सुगम है। गणों की बातें सुनकर उन सब ने उसे स्वीकार किया ॥२०६॥ तदनन्तर प्रभास के प्रवेश करते ही वह अँधेरी गुफा कुछ प्रकाशित हो गई ॥२०७॥ गुफा के अन्दर बैठे हुए अति भयंकर रूपवाले चार राक्षस उठकर प्रणाम करते हुए उससे बोले—'आइए' ॥२०८॥ तब प्रभास ने अन्दर जाकर और उन दिव्य सात ओषधियों को लेकर और बाहर आकर उन्हें सूर्यप्रभ को दिया ॥२०९॥ उसी समय आकाशवाणी हुई कि ये सातों ओषधियाँ महाप्रभावशालिनी हैं। हे सूर्यप्रभ ये ओषधियाँ तुम्हें सिद्ध हो गई ॥२१०॥ यह सुनकर अत्यन्त प्रसन्न वे सभी वहाँ से चलकर सुमेध के आश्रम में स्थित अपने सेना शिविर में लौट आये ॥२११॥ वहाँ आकर सुनीथ ने सुबाहुकुमार से पूछा कि 'गुफा में सूर्यप्रभ को रोककर प्रभास को क्यों जाने दिया इन दोनों में क्या अन्तर है ?॥२१२॥