कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextअष्टम लम्बक ४४५ जब सिद्धि-सम्पन्न सूर्यप्रभ भी द्वार में प्रवेश नहीं प्राप्त कर सका तो वह एकाग्र चित्त से शिवजी की स्तुति करने लगा ॥१७४॥ तब द्वार को खोलकर हाथी के मुखवाले एक पुरुष ने उससे कहा—'आओ प्रवेश करो। तुम पर भगवान् हेरम्ब प्रसन्न हैं'॥१७५॥ उस द्वार में प्रवेश करते हुए आश्चर्य-चकित सूर्यप्रभ ने अति विस्तृत ज्योतिर्मय शिला पर बैठे हुए, बारह सूर्यों के समान चमकते हुए, एक दंतवाले लम्बे पेटवाले और तीन नेत्रोंवाले गणेशजी को देखा जिनके हाथ में परशु, कुल्हाड़ा और गदा चमक रहे थे ॥१७६-१७७॥ वे विनायक भिन्न-भिन्न मुखोंवाले गणेशों से घिरे हुए थे। सूर्यप्रभ ने उन्हें देखा और उनके चरणों में नम्र होकर प्रणाम किया ॥१७८॥ विनायक ने भी सूर्यप्रभ से आने का कारण पूछा और स्नेहपूर्ण वाणी से कहा कि 'इस मार्ग से चढ़ो। सूर्यप्रभ उनके बताये हुए मार्ग से पाँच योजन (बीस कोस) और ऊपर चढ़ गया तथा उसने पद्मराग मणि के दूसरे बड़े द्वार को देखा। वहाँ भी उसने प्रवेश न पा सकने के कारण एकाग्रचित होकर और अनन्य भाव से पिनाकपाणि महादेव की शिवसहस्रनाम से स्तुति की ॥१७९-१८१॥ स्वामी कार्तिक के विशाख नामक पुत्र ने स्वयं द्वार खोला और अपना परिचय देकर उसे भीतर प्रवेश कराया। भीतर जाकर उसने अग्नि की स्वाहा के समान दमकते हुए विशाख शाख आदि पाँच पुत्रों से युक्त उत्पन्न होते ही नम्र दुष्ट ग्रहों तथा बालग्रहों से चरणों पर प्रणाम करते हुए करोड़ों गणेशों से सेवित कुमार स्वामी को देखा ॥१८२-१८४॥ उन्होंने सूर्यप्रभ से आने का कारण पूछकर उसे ऊपर चढ़ने का मार्ग बता दिया ॥१८५॥ इसी प्रकार महाकाल वीरभद्र नन्दी और भृंगी गणों से रक्षित अन्य पाँच रत्नों के द्वार को पार करते हुए स्फटिक मणि के विशाल द्वार को उसने देखा ॥१८६-१८७॥ वहाँ पर देवदेव महादेव की स्तुति करते हुए उसे एकादश रुद्रों में से एक रुद्र ने द्वार खोलकर आदर के साथ भीतर प्रवेश कराया और उसने स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर शिवधाम का दर्शन किया ॥१८८॥