BharatKosha
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 484 of 1079

Read in context
Page 484

अष्टम लम्बक ४४७ जिस धाम में दिव्य पुरुषों के झुंड वृक्षों पर झूल रहे थे और वृक्ष पुष्पों से लदे हुए थे। वहाँ गन्धर्व गान कर रहे थे और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं॥१८६॥ वहीं एक ओर सूर्यप्रभ ने स्फटिक के सिंहासन पर बैठे हुए, तीन नेत्रोंवाले हाथ में शूल लिये हुए, चमकते हुए स्फटिक के समान स्वच्छ पीली जटाओं को बाँधे हुए, सुन्दर अर्धचन्द्र से शोभित मस्तक वाले और पार्श्व में बैठी हुई भगवती गौरी से शोभित महादेव को देखा उनके समीप जाकर गौरी और शंकर के चरणों में वह नतमस्तक हुआ ॥ १८९-१९१॥ तब पीठ को हाथ से थपथपाकर और उठाकर बैठाये गये सूर्यप्रभ से शिवजी ने पूछा— 'किसलिए आये हो ? ॥१९२॥ सूर्यप्रभ ने कहा—'प्रभो मेरा अभिषेक शीघ्र ही होनेवाला है। अतः, आपके वहाँ पधारने की प्रार्थना है॥१९३॥ तब शिवजी ने उससे कहा—'बेटे, तो तुमने इतना कष्ट क्यों उठाया? मुझे आने के लिए यहीं स्मरण क्यों नहीं कर लिया ?॥१९४॥ तो ठीक है, मैं आऊँगा ऐसा कहकर भक्तवत्सल भगवान् ने पास बैठे हुए एक गण को बुलाकर कहा—'जाओ इसे (सूर्यप्रभ को) अभिषेक के लिए ऋषभ पर्वत पर ले जाओ। वह ऋषभ पर्वत विद्याधर चक्रवर्तियों का अभिषेक-स्थान है। भगवान् से आज्ञापित गण ने प्रदक्षिणा और प्रणाम किये हुए सूर्यप्रभ को नम्रता-पूर्वक गोद में उठा लिया और उसे ले जाकर ऋषभ पर्वत पर बैठा दिया। अपनी सिद्धि के प्रभाव से वह उसी क्षण वहाँ से अदृश्य हो गया ॥१९५—१९९॥ सूर्यप्रभ जब ऋषभ पर्वत पर ही था तब उसके सभी मित्र मन्त्री कामचूड़ामणि आदि सभी पत्नियां सभी विद्याधरों के राजा इन्द्र-सहित सभी देवता मय आदि सभी असुर, याज्ञवल्क्य आदि सभी ऋषिगण तथा श्रुतदेव और सुबाहुकुमार आदि वहाँ एकत्र हुए। सूर्यप्रभ ने भी सभी का स्वागत करके उनका यथोचित सम्मान किया और शिवजी के निमन्त्रण का वृत्तान्त सुनकर सभी को प्रसन्न किया। उन सब ने भी उसे इस बात पर बधाई दी ॥२००-२०२॥ तब सूर्यप्रभ के प्रभास आदि मन्त्री मित्र मणियों और सोने के विविध कलशों में नाना प्रकार की ओषधियों से युक्त समस्त नदियों, नदों, समुद्रों और तीर्थों का जल ले स्वयं जाकर लाय ॥२०३॥

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · Page 484 of 1079 · BharatKosha