कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 494 of 1079
Read in context'बेटा यदि तुम्हारी इस अवस्था में ही तुम्हें वैराग्य हुआ है तो क्या वह मुझ वृद्ध को नहीं होगा ? अतः मैं भी वन में जाऊँगा' ॥३७॥ ऐसा कहकर और मर्त्यलोक में जाकर राजा ने ब्राह्मणों को रत्नों और सुवर्णों के दस हजार भार दान में दे दिये ॥३८॥ और, अपने नगर में आकर पत्नी कांचनप्रभा से कहा कि 'तुम्हें मेरी आज्ञा से इसी नगर में रहना होगा ॥३९॥ यहाँ रहकर इस कन्या अलंकारवती की रक्षा करनी होगी और समय आने पर, एक वर्ष पूरा होने पर,—क्योंकि आज का दिन ही उसके विवाह के लिए शुभ है। यही दिन इसके विवाह के शुभ लग्नवाला है—इसी दिन मैं स्वयं आकर इसे जामाता नरवाहनदत्त के लिए दूँगा। वह चक्रवर्ती जामाता हमारे इस नगर की रक्षा करेगा' ॥४०-४१॥ ऐसा कहते हुए राजा रोती हुई पत्नी और पुत्री को धपय देकर और उन्हें अपने घर छोड़कर स्वयं पुत्र के साथ वन को चला गया ॥४२॥ तब वह रानी कांचनप्रभा अपनी कन्या के साथ अपने नगर में ही रहने लगी। सच है कौन पतिव्रता स्त्री पति की आज्ञा का उल्लंघन कर सकती है ॥४३॥ तब राजा मलंकारशील की वह कन्या अलंकारवती स्नेह के साथ तीर्थयात्रा करती हुई अपनी माता के संग बहुत-से शैव तीर्थों का भ्रमण करने लगी ॥४४॥ एक बार उस अलंकारवती को प्रज्ञप्ति नामकी विद्या ने कहा कि कश्मीर में बहुत से स्वयंभू तीर्थ हैं। उनमें जाकर तप पूजन आदि करो। तब तुम विद्याविष के सब विद्याधरों के चक्रवर्ती नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त कर सकोगी ॥४५ ४६॥ विद्या के द्वारा ऐसा आदेश मिलने पर अलंकारवती ने माता के साथ कश्मीर जाकर अनेक पुण्यतीर्थों में शिव की पूजा की ॥४७॥ नन्दिक्षेत्र में महादेव पर्वत पर, अमर पर्वत पर, सुरेश्वरी पर्वत पर, विजय पर्वत तथा कपटेश्वर आदि क्षेत्रों में पार्वती-पति शिव की पूजा करके वह कन्या और उसकी माता अपने घर लौट आई ॥४८ ४९॥ हे सुभट, इस कन्या को तुम वही अलंकारवती समझो और मुझे उसकी माता कांचनप्रभा ॥५०॥ आज यह अलंकारवती मुझे बिना कहे ही यहाँ चली आई। मैंने भी प्रज्ञप्ति विद्या के प्रभाव से इसका यहाँ आना जानकर, यहाँ आ गई हूँ ॥५१॥ ५८