कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम लम्बक ४८५ वह सुन्दरपुर रत्नों से जड़े हुए सोने के महलों से हिमालय में भी सुमेरु पर्वत की भ्रान्ति उत्पन्न कर रहा था ॥११॥ आकाश से उतरकर और विमान से बाहर निकलकर वह उस नगर में प्रविष्ट हुआ। उसके आगमन पर हिलती हुई ध्वजाओं से मानों सुन्दरपुर नगर, अपने स्वामी को प्राप्त कर प्रसन्नता प्रकट कर रहा था ॥१२॥ तदनन्तर, सास द्वारा मंगलाचार किये जाने पर, नरवाहनदत्त अपने मित्र वसन्तक और वधू अलङ्कारवती के साथ राजभवन में गया ॥१३॥ वहाँ पर सास द्वारा विद्या के प्रभाव से प्राप्त किये गये दिव्य भोगों को भोगता हुआ वह स्वर्ग में इन्द्र के समान रहने लगा ॥१४॥ किसी दिन उसकी सास काञ्चनप्रभा ने उससे कहा-'इस नगर में स्वयम्भू भगवान् उमापति शिव का मन्दिर है ॥१५॥ उनके दर्शन और पूजन से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो सकते हैं। अलङ्कारवती के पिता ने वहाँ एक विशाल उद्यान बनाया है ॥१६॥ और, यथार्थ नामवाला गंगासर नाम का तीर्थ भी बनाया है। आज वहाँ उनका दर्शन और विहार करने चलो' ॥१७॥ सास के इस प्रकार कहने पर नरवाहनदत्त अपने साथियों और अलङ्कारवती के साथ वहाँ गया ॥१८॥ वह स्थान सोने की प्रधान शाखाओंवाले रत्नों की छोटी डालियोंवाले और लटकते हुए मोतियों के गुच्छों से सुशोभित वृक्षों से युक्त था ॥१९॥ वहाँ पर गंगासर में स्नान और शिव का पूजन कर लेने के उपरान्त नरवाहनदत्त रत्ना की सीढ़ियोंवाली और सोने के कमलों से शोभित बावलियों में भ्रमण करने लगा ॥२०॥ उन बावलियों के रमणीय किनारों पर भ्रमण करता हुआ वह, कल्पलता-गृहों में अलङ्कार वती और साथियों के साथ विहार करने लगा ॥२१॥ दिव्य मद्यपान संगीत गोष्ठी और मरुभूति द्वारा किये जाते हुए सुन्दर हास्य विलासों से वह वहाँ अपना मनोरंजन कर रहा था ॥२२॥ इस प्रकार, सास की विद्या के प्रभाव से जाग्रत् रैनों और उद्यान भूमि में विहार करते हुए नरवाहनदत्त ने वहाँ एक मास व्यतीत किया ॥२३॥ तदनन्तर, उस काञ्चनप्रभा द्वारा दिव्य वस्त्रों एवं आभूषणों से अलङ्कृत नरवाहनदत्त अपनी वधू, मन्त्री और काञ्चनप्रभा के साथ उसी विमान द्वारा कौशाम्बी नगरी को लौट आया और उसने अपने माता पिता की आंखों को आनन्दित किया ॥२४ २५॥