कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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कौशाम्बी पहुँचने पर वासवदत्ता और वत्सराज उदयन के सामने माता कांचनप्रभा ने पुत्री अलंकारवती से कहा—॥२६॥ 'बेटी ईर्ष्या और क्रोध से तुम अपने स्वामी को कभी कष्ट न देना। इस पाप से होनेवाला वियोग गम्भीर दुःख और पश्चात्ताप का कारण होता है ॥२७॥ 'मैंने अपने यौवन-काल में ईर्ष्या के कारण पति को कष्ट दिया था इसी कारण आज उनके वन में चले जाने पर पश्चात्ताप और वियोग से जल रही हूँ' ॥२८॥ पुत्री को इस प्रकार की शिक्षा देकर आंसुओं से भरी आँखोंवाली कांचनप्रभा अलंकारवती का आलिंगन करके और आकाश में उड़कर अपनी नगरी को चली गई ॥२९॥ तदनन्तर, प्रातःकालोचित क्रिया (स्नानादि) करके नरवाहनदत्त के मन्त्रियों के साथ बैठे रहने पर एक भयभीता और विलासिनी स्त्री अलंकारवती के पास आकर कहने लगी— 'मेरी रक्षा करो रक्षा करो' ॥३०-३१॥
अशोकमाला की कथा
'यह ब्राह्मण मुझे मारने के लिए बाहर खड़ा है। उसके भय से मैं शरणार्थिनी होकर आपके पास आई हूँ' ॥३२॥ 'डरो मत' अपना हाल बताओ कि वह कौन है और तुम्हें क्यों मारना चाहता है? अलंकारवती के इस प्रकार पूछने पर उसने फिर कहना प्रारम्भ किया—॥३३॥ "हे स्वामिन्, मेरा नाम अशोकमाला है। मैं इस नगरी में बलसेन नामक क्षत्रिय से उत्पन्न हुई हूँ ॥३४॥ जब मैं कुमारी थी तभी मेरे रूप के लोभी हठशर्मा नामक धनी ब्राह्मण ने मुझे मेरे पिता से माँग लिया था ॥३५॥ 'मैं इस बुरी और भीषण आकृतिवाले पुरुष को अपना पति न बनाऊँगी और पिता के दे देने पर भी मैं इसके घर न रहूँगी'—ऐसा मैंने अपने पिता से कहा ॥३६॥ यह सुनकर हठशर्मा ने मेरे पिता के घर पर अनशन प्रारम्भ कर दिया। तब ब्रह्महत्या के भय से मेरे पिता ने मुझे उसे दे दिया ॥३७॥ तदनन्तर, मुझे विवाहित करके मेरे न चाहने पर भी हठशर्मा, मुझे बलात् अपने घर ले गया तब मैंने उसे छोड़कर एक क्षत्रियकुमार का आश्रय लिया ॥३८॥ हठशर्मा ने राज दण्ड के डर से उसकी उपेक्षा की तो मैं उसे भी छोड़कर दूसरे क्षत्रियकुमार के पास चली गई ॥३९॥