कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextनवम लम्बक ४११ यह मानुषी नहीं है। इसका रहस्य सुनो। आषाढ़क नाम का विद्याधरों का एक राजा है॥५५॥ उस पुत्रहीन राजा के यहाँ दैवयोग से यह एक ही कन्या हुई और अंगारमाला के नाम से पिता के घर पर ही यह बड़ी हुई॥५६॥ यौवनप्राप्त इस कन्या ने अपने रूप के घमंड में प्रार्थना करने पर भी किसी का पति नहीं माना ॥५७॥ इसके इस हठ से क्रुद्ध होकर पिता ने इसे शाप दिया कि तू मनुष्य योनि में जा। उस योनि में भी तेरा यही नाम होगा ॥५८॥ मत्त सिंह से क्रुद्ध ब्राह्मण मुझसे विवाह करेगा। तू उसे छोड़कर उत्तर मन्द में अनङ्गप्रभ तीन पत्नियों के पास जायगी ॥५९॥ वहाँ से भी भागकर एक बलवान् राजपूत के पास जायगी। वह तुझे रख लेगा। किन्तु, वहीं उन्मत्त देखकर तेरा पति तुझे मारने के लिए दौड़ेगा तब तू राजभवन में घुसकर इस शाप से मुक्त हो जायगी ॥६०-६१॥ इस प्रकार, पूर्वजन्म में जो अङ्गारमाला नाम की विद्याधरी थी, वही इस पिता के शाप से मानुषी बनी है॥६२॥ अब इसके शाप का अन्त हो गया है और अब वह विद्याधर-लोक में जाकर फिर अपना विद्याधर-शरीर प्राप्त करेगी ॥६३॥ तब वह अमितगति नामक विद्याधर राजा से विवाहित होकर और अपने रूप का स्मरण करके अप्सरासमान बनेगी ॥६४॥ ऐसा कहकर दिव्यवाणी मौन हो गई और वह अङ्गारमाला भी प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़ी ॥६५॥ उसे इस प्रकार देखकर अनङ्गप्रभो और मकरन्ददत्त राजा को सौंप कर चले गए ॥६६॥ यहाँ पर ही उन्होंने उस कन्या का दाह-संस्कार किया और दोनों विलाप करने लगे कि हमारी अकारण रक्षा हो गई किन्तु इस कन्या का ॥६७॥ यह सुन कर उन तपस्वियों ने उस राजा तथा अनङ्गप्रभ आदि दोनों को समझा कर शान्त कर दिया है। ...॥६८॥